प्रेम, जलन और हत्या का ऐसा खेल जिसने पूरे मध्यप्रदेश को हिला दिया, नागिन मोड़ हत्याकांड की रूह कंपा देने वाली सच्ची कहानी | Raisen Blind Murder

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भोपाल-जबलपुर नेशनल हाईवे-45 की वह सड़क रात होते ही किसी डरावनी फिल्म का दृश्य लगने लगती थी। पहाड़ियों के बीच सांप की तरह मुड़ता नागिन मोड़… नीचे गहरी खाई… ऊपर घना अंधेरा… और चारों तरफ फैला जंगल। ट्रक ड्राइवर भी उस इलाके से गुजरते वक्त अनजाने डर से हॉर्न बजाने लगते थे। स्थानीय लोग कहते थे कि वहां रात में रुकना ठीक नहीं। लेकिन 7 मई 2026 की सुबह उस जगह ने ऐसा राज उगला जिसने पूरे मध्यप्रदेश को हिला दिया।

सुबह करीब सात बजे वन विभाग का एक फॉरेस्ट गार्ड रोज की तरह गश्त कर रहा था। हवा में तेज बदबू घुली हुई थी।

पहले उसे लगा कि शायद कोई जंगली जानवर मरा होगा। लेकिन जैसे ही उसने खाई की तरफ झांका, उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। नीचे एक सफेद बोरा पड़ा था… उसका गला सूख गया। कांपते हाथों से उसने तुरंत पुलिस को फोन लगाया।

कुछ ही देर में बाड़ी थाना पुलिस मौके पर पहुंच गई। सायरन की आवाज जंगल में गूंज रही थी। थाना प्रभारी राजेश तिवारी नीचे खाई में उतरे। बदबू इतनी भयानक थी कि कई पुलिसकर्मियों ने मुंह पर कपड़ा बांध लिया। जब बोरे को खोला गया तो वहां मौजूद हर आदमी कुछ सेकंड के लिए थम गया। अंदर एक इंसानी शव था। हाथ-पैर बंधे हुए। मुंह पर मोटी टेप चिपकी हुई। शरीर पूरी तरह सड़ चुका था। चेहरा पहचान से बाहर था। साफ लग रहा था कि हत्यारों ने पूरी योजना बनाकर पहचान मिटाने की कोशिश की थी।

घटनास्थल पर कोई पहचान पत्र नहीं था। कोई मोबाइल नहीं। कोई ऐसा सामान नहीं जिससे पता चल सके कि यह आदमी कौन है। लेकिन तभी पुलिस की नजर एक पुराने थैले पर पड़ी। उसमें जूते, कंघी और एक बच्चे की होमवर्क नोटबुक रखी थी। देखने में मामूली लगने वाली वही कॉपी इस पूरे अंधे कत्ल की सबसे बड़ी गवाह बनने वाली थी।

घटना की गंभीरता को देखते हुए तत्काल अंधे कत्ल के खुलासे के लिए एसडीओपी बाड़ी श्रीमती नीलम चौधरी को निर्देश दिए गए जिनके मार्गदर्शन में थाना प्रभारी निरीक्षक राजेश तिवारी द्वारा अलग-अलग पुलिस टीमों का गठन किया गया।

शव की हालत इतनी खराब थी कि पहचान करना लगभग नामुमकिन था। लेकिन अनुभवी पुलिस अधिकारी जानते थे कि अपराधी चाहे कितना भी चालाक क्यों न हो, कोई न कोई गलती जरूर करता है। पुलिस ने नोटबुक के हर पन्ने को खंगालना शुरू किया। उसमें एक दुकान का नाम था, बच्चे की लिखावट थी, कुछ होमवर्क और एक टीचर के हस्ताक्षर। बस यही एक धागा था और पुलिस उसी धागे को पकड़कर नरसिंहपुर जिले के साईंखेड़ा तक पहुंच गई।

पुलिस टीम ने हार न मानते हुए घटनास्थल से मिले छोटे-छोटे साक्ष्यों को आधार बनाकर जांच को आगे बढ़ाया।
पुलिस द्वारा बरामद बच्चे की नोटबुक एवं थैले पर लिखे पते के आधार पर साईंखेड़ा क्षेत्र में पड़ताल की शुरुआत की गई। लगातार पूछताछ एवं स्थानीय स्तर पर जानकारी जुटाते हुए उक्त नोटबुक पर चेकिंग करने वाले टीचर की खोजबीन शुरू की।
गांव छोटा था। लोग एक-दूसरे को नाम से पहचानते थे। जब पुलिस ने स्कूल में पूछताछ की तो आखिरकार एक शिक्षक ने कॉपी को पहचान लिया। उसने बताया कि यह कॉपी एक ऐसे बच्चे की है जिसका परिवार पिछले कई दिनों से अचानक गायब है। पुलिस तुरंत उस घर तक पहुंची। दरवाजे पर ताला लटका था। पड़ोसियों ने बताया— “रीना कई दिनों से दिखाई नहीं दी…”
दरअसल यह नोटबुक किसी और बच्चे की नहीं बल्कि रीना के 10 साल के बालक की थी।

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यहीं से पुलिस का शक गहरा गया।

रीना किरार… 29 साल की महिला… जानकी विहार कॉलोनी साईंखेड़ा की रहने वाली थी। रीना अपने पति से अलग हो चुकी थी और अपने 10 साल के बच्चे के साथ रहती थी । गांव में लोग उसे अलग नजर से देखते थे। उसे सजना-संवरना पसंद था। सोशल मीडिया पर घंटों एक्टिव रहती। फेसबुक पर फोटो डालती। इंस्टाग्राम पर रील्स बनाती। गांव की औरतें उसकी आदतों पर ताने मारतीं लेकिन रीना को इन बातों की परवाह नहीं थी। उसका पति उसे छोड़ चुका था और वह अकेलेपन से लड़ रही थी। शायद इसी अकेलेपन ने उसे सोशल मीडिया की चमकदार दुनिया में धकेल दिया था।

करीब तीन साल पहले फेसबुक पर उसकी मुलाकात राजस्थान के भीलवाड़ा निवासी वीरू उर्फ पप्पू जाट से हुई। शुरुआत लाइक और कमेंट से हुई। फिर देर रात तक चैट होने लगी। धीरे-धीरे दोनों के बीच रिश्ता गहरा हो गया। वीरू अक्सर लिखता— “तुमसे मिले बिना अब चैन नहीं आता…” रीना भी उसे अपने दुख सुनाती। कुछ ही महीनों में यह रिश्ता प्यार में बदल गया।

वीरू जाट 32 साल का था। लंबा-चौड़ा, मिलनसार और भावुक इंसान। दोस्तों के मुताबिक वह रिश्तों को दिल से निभाता था। जब उसने रीना को अपनाया तो पूरी तरह उसी का होकर रह गया। वह राजस्थान से मध्यप्रदेश तक 900 किलोमीटर का सफर तय करके उससे मिलने आने लगा। लेकिन उसे नहीं पता था कि जिस घर में वह प्यार तलाशने आ रहा है, वहीं उसकी मौत लिखी जा चुकी है।

रीना अपने पति कमलेश किरार से अलग रहती थी उसकी जिंदगी में वीरू से पहले भी एक आदमी था— अरुण पटेल। बचपन का प्रेमी। गांव में लोग जानते थे कि दोनों के बीच पुराने संबंध हैं। अरुण रीना पर दिल खोलकर पैसा खर्च करता था। उसने उसे महंगी XUV 700 दिलाई, सोने के जेवर दिए और घर का खर्च उठाता था। लेकिन अरुण का प्यार धीरे-धीरे जुनून बन चुका था। जब उसे वीरू के बारे में पता चला तो उसके भीतर जलन की आग भड़क उठी।
अरुण अक्सर रीना से कहता— “मैं सब कुछ करूं… और तू किसी दूसरे के साथ घूमे?”

रीना दोनों रिश्तों के बीच उलझी हुई थी। एक तरफ वीरू का भावनात्मक प्यार था, दूसरी तरफ अरुण का पैसा और सहारा। लेकिन यह दोहरी जिंदगी ज्यादा दिनों तक नहीं चल सकती थी।

करीब दो साल पहले इसी बात को लेकर वीरू और अरुण के बीच विवाद भी हुआ था। मामला थाने तक पहुंचा। लेकिन उसके बाद अरुण के भीतर एक खतरनाक सोच जन्म ले चुकी थी— “अगर वीरू नहीं रहेगा… तो रीना सिर्फ मेरी होगी…”

यहीं से हत्या की पटकथा लिखी गई।

पुलिस पूछताछ में सामने आया कि कई दिनों तक इस हत्या की योजना बनाई गई। अरुण, रीना और हरनाम सिंह किरार ने तय किया कि वीरू को साईंखेड़ा बुलाया जाएगा। घर के अंदर उसकी हत्या होगी और शव दूसरे जिले में फेंक दिया जाएगा ताकि पुलिस गुमराह हो जाए।

29 अप्रैल 2026 की शाम रीना ने वीरू को फोन किया। उसकी आवाज में वही पुरानी मिठास थी— “बहुत दिन हो गए… मिलने आ जाओ…”

वीरू खुश हो गया। उसने शायद रास्ते भर रीना के साथ भविष्य के सपने देखे होंगे। उसे क्या पता था कि यह सफर उसकी जिंदगी का आखिरी सफर है।

रात होते-होते वह साईंखेड़ा पहुंचा। रीना ने दरवाजा खोला। चेहरे पर मुस्कान थी लेकिन आंखों में बेचैनी। घर के अंदर पहले से अरुण और उसका दोस्त हरनाम मौजूद थे। कमरे में अजीब सन्नाटा था।
क्या हुआ?” वीरू ने पूछा।
अचानक पीछे से बेसबॉल बैट का जोरदार वार हुआ।
धड़ाक!

पहला वार सिर पर पड़ा और वीरू लड़खड़ा गया। उसने पीछे मुड़कर देखा— सामने अरुण था। उसकी आंखों में खून उतर चुका था।
बहुत आशिक बनता है?” अरुण चीखा।
इसके बाद ताबड़तोड़ वार शुरू हो गए। हरनाम भी टूट पड़ा। बेसबॉल बैट सिर, चेहरे और शरीर पर लगातार बरस रहा था। कमरे में चीखें गूंजने लगीं। वीरू दर्द से तड़पते हुए रीना की तरफ देखता रहा— “रीना… बचा लो…

लेकिन रीना चुप खड़ी रही।
कुछ ही मिनटों में वीरू जमीन पर गिर पड़ा। उसके सिर से बहता खून पूरे कमरे में फैल चुका था। उसकी सांसें टूटने लगीं… और फिर सब खत्म हो गया।

कमरे में सन्नाटा छा गया।
हत्या के बाद तीनों घबरा गए। अब सबसे बड़ा सवाल था— शव का क्या करें? उन्होंने कमरे में फैला खून साफ करना शुरू किया। फर्श धोया गया। दीवारें साफ की गईं। फिर शव के हाथ-पैर बांधे गए। मुंह पर टेप लगाई गई। पुलिस के मुताबिक शव को बोरे में फिट करने के लिए उसे दबाकर मोड़ा गया था। यह दृश्य इतना खौफनाक था कि बाद में जांच अधिकारियों ने भी कहा— “ऐसी बेरहमी कम मामलों में देखने को मिलती है।”

आधी रात के बाद XUV 700 घर से निकली। डिक्की में एक इंसान की लाश पड़ी थी और आगे सीट पर बैठे लोग पुलिस से बचने की योजना बना रहे थे। करीब 200 किलोमीटर दूर रायसेन जिले के नागिन मोड़ को चुना गया क्योंकि वहां जंगल था, गहरी खाई थी और शव जल्दी खराब हो सकता था।

रात के अंधेरे में कार नागिन मोड़ सिरवारा ब्रिज पर रुकी। नीचे गहरी खाई थी। जंगल से अजीब आवाजें आ रही थीं। तीनों ने बोरे को घसीटकर किनारे तक लाया। कुछ सेकंड तक वे खामोश खड़े रहे। फिर एक जोरदार धक्का दिया गया। बोरा नीचे अंधेरे में गिरता चला गया। पत्थरों से टकराने की आवाज कुछ देर तक आती रही… फिर सब शांत हो गया।
उन्हें लगा था कि कहानी यहीं खत्म हो जाएगी।लेकिन असली कहानी तो अब शुरू हुई थी।

हत्या के बाद आरोपी लगातार शहर बदलते रहे। पहले बाड़ी, फिर इटारसी, उसके बाद मुंबई का कल्याण, फिर इंदौर और आखिर में उज्जैन। उन्हें भरोसा था कि पुलिस कभी उन तक नहीं पहुंच पाएगी। क्योंकि शव सड़ चुका था। पहचान मिट चुकी थी। लेकिन वे भूल गए थे कि अपराधी की सबसे बड़ी दुश्मन उसकी छोटी-सी गलती होती है।
और इस केस में वह गलती थी— बच्चे की होमवर्क कॉपी।
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पुलिस ने उसी कॉपी के जरिए शिक्षक तक पहुंच बनाई। शिक्षक से बच्चे तक। बच्चे से परिवार तक। और परिवार से सीधे हत्यारों तक।

उज्जैन में मुखबिर की सूचना पर पुलिस ने घेराबंदी की। तीनों आरोपी पकड़े गए। शुरुआत में वे अनजान बनने की कोशिश करते रहे। लेकिन जब मोबाइल चैट, लोकेशन और सबूत सामने रखे गए मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ की गई तो उनका सब्र टूट गया।

घंटों की पूछताछ के बाद आखिरकार रीना रो पड़ी।उसने धीमी आवाज में कहा— “हाँ… हमने उसे मार दिया…

इसके बाद पूरी कहानी सामने आ गई। प्यार… जलन… पैसा… धोखा… और एक सुनियोजित हत्या।

पुलिस ने वारदात में इस्तेमाल बेसबॉल बैट, XUV 700 और मोबाइल फोन बरामद कर लिए। अदालत में पेशी के दौरान लोगों की भारी भीड़ जमा हो गई। हर कोई उन चेहरों को देखना चाहता था जिन्होंने प्यार के नाम पर इतनी बेरहम हत्या की थी।

आज भी नागिन मोड़ की खाई उस रात की गवाह बनी हुई है। ट्रक ड्राइवर जब वहां से गुजरते हैं तो कई लोग नीचे झांकते जरूर हैं। क्योंकि उन्हें याद आ जाता है कि कभी वहां एक बोरे में बंद इंसान पड़ा मिला था… एक ऐसा इंसान जो प्यार की तलाश में आया था… लेकिन उसे मिला सिर्फ धोखा, साजिश और मौत।

मौसी के लड़के से बचपन का प्यार… फिर पति को छोड़ लौट आई रीना

रीना और अरुण का रिश्ता कोई नया नहीं था। दोनों बचपन से एक-दूसरे के बेहद करीब थे। बताया जाता है, कि रिश्तेदारी में अरुण, रीना का मौसी का लड़का लगता था, लेकिन समय के साथ दोनों का लगाव प्रेम संबंध में बदल गया। परिवार को जब इस रिश्ते की भनक लगी तो उन्होंने दोनों को अलग करने का फैसला कर लिया। जल्दबाजी में रीना और अरुण की शादियां अलग-अलग जगह कर दी गईं, ताकि दोनों हमेशा के लिए दूर हो जाएं।
मगर शादी उनकी मोहब्बत को खत्म नहीं कर सकी। रीना कुछ समय बाद अपने पति का घर छोड़कर वापस साईंखेड़ा आ गई। उधर अरुण भी अपनी पत्नी से अलग रहने लगा। इसके बाद दोनों फिर करीब आ गए। अरुण ने रीना के लिए अलग मकान बनवाया, महंगे गहने दिलाए और आलीशान XUV तक खरीदकर दी। गांव में लोग कहते थे कि रीना की पूरी जिंदगी का खर्च अब अरुण ही उठाता था। सब कुछ उनके हिसाब से चल रहा था, लेकिन तभी सोशल मीडिया के जरिए वीरू जाट की एंट्री हुई और यही नया रिश्ता आगे चलकर खून-खराबे की वजह बन गया।

अंधे कत्ल जैसे जघन्य एवं चुनौतीपूर्ण मामले का अल्प समय में सफल खुलासा करने में थाना प्रभारी निरीक्षक राजेश तिवारी, उप निरीक्षक संजय यादव, उनि. विनीता विश्वकर्मा, सउनि. मोहन यादव, सउनि. सुरेन्द्र सिसोदिया, प्र. आर. 28 जितेन्द्र, प्र.आर. 65 प्रेम सिंह दांगी, प्र.आर. 147 रीना पूर्वी, प्र.आर. 624 राजेन्द्र यादव, आरक्षक 671 रमाकांत पटेल, आरक्षक 464 रामूसिंह एवं आरक्षक 15 देवेन्द्र की विशेष एवं सराहनीय भूमिका रही।


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PANKAJ JAIN
Author: PANKAJ JAIN

पत्रकारिता में 2009 से सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। "दैनिक अग्निबाण" में लंबी पारी के बाद "SCN NEWS" सहित कई संस्थानों में न्यूज़ डेस्क का नेतृत्व किया। वर्तमान में सा. "क्राइम अगेंस्ट न्यूज", दैनिक "तेजस रिपोर्टर" और कई डिजिटल प्लेटफार्म के संपादकीय प्रमुख हैं। सामाजिक सरोकारों, विशेषकर हाशिए पर खड़े वर्ग और अन्याय के मुद्दों पर लेखन में विशेष रुचि रखते हैं। इसके साथ ही "जिनोदय" और "पंकज का पंच" जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के निदेशक हैं, जो जनचेतना और वैचारिक संवाद को बढ़ावा देने का माध्यम हैं।

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