मुनि पुगंव श्री सुधासागरजी महाराज के सान्निध्य में पचराई तीर्थ मेला सम्पन्न, पश्चिमी सोच पर जताई चिंता — बोले, वृद्धजन बोझ नहीं बल्कि मंगल के प्रतीक

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✍️ अतुल कुमार जैन
शिवपुरी | भारत की सभ्यता केवल समय के साथ आगे नहीं बढ़ती, बल्कि वह अपनी सांस्कृतिक, धार्मिक और आध्यात्मिक जड़ों को और अधिक गहराई देती जाती है। इसी जीवंत परंपरा का साक्षात उदाहरण प्राचीन नगरी कदवया के समीप स्थित अतिशय क्षेत्र पचराई तीर्थ रहा, जहां राष्ट्र संत मुनि पुगंव श्री सुधासागरजी महाराज के पावन सान्निध्य में भव्य मेला महोत्सव श्रद्धा, संस्कार और संस्कृति के अद्भुत संगम के रूप में सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर जैन समाज ने सामूहिक रूप से आभार प्रकट करते हुए भारतीय दर्शन की मूल भावना—वृद्ध सम्मान—को पुनः केंद्र में स्थापित किया।
मेला महोत्सव को संबोधित करते हुए मुनि पुगंव श्री सुधासागरजी महाराज ने कहा कि भारत की पहचान उसकी संस्कृति से है, जहां उम्र के साथ व्यक्ति का सम्मान बढ़ता है। उन्होंने पाश्चात्य समाज की जीवनशैली की तुलना करते हुए कहा कि वहां उपयोगिता के आधार पर रिश्तों को तौला जाता है, जबकि भारत में वृद्धजन अनुभव, आशीर्वाद और मंगल के प्रतीक माने जाते हैं। भारतीय संस्कृति में वृद्धावस्था बोझ नहीं, बल्कि सौभाग्य का चिन्ह है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जिस घर में वयोवृद्ध होते हैं, वहां कल्याण और शुभता स्वतः निवास करती है।
महाराज श्री ने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की कि आज पश्चिमी प्रभाव के कारण कुछ परिवारों में वृद्ध माता-पिता को उपेक्षा का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने चेताया कि जो समाज अपने बुजुर्गों को भार समझने लगता है, वह स्वयं नैतिक पतन की ओर बढ़ता है। उनके अनुसार संतान का पालन स्वार्थ हो सकता है, किंतु वृद्ध माता-पिता की सेवा परमार्थ है, और यही सेवा जीवन को सार्थक बनाती है।
कार्यक्रम में यह भी उल्लेख किया गया कि पचराई तीर्थ की स्थापना पांडा शाह द्वारा की गई थी और यह तीर्थ सदियों से आस्था का केंद्र रहा है। मध्यप्रदेश महासभा के संयोजक विजय धुर्रा ने कहा कि इस प्राचीन तीर्थ पर आयोजित मेला महोत्सव को राष्ट्र संत का सान्निध्य मिलना अपने आप में ऐतिहासिक क्षण है। महामंत्री डॉ. चक्रेश जैन ने आगामी दिनों में तीर्थोदय तीर्थ गोलाकोट में प्रस्तावित भव्य पंचकल्याणक महोत्सव की जानकारी देते हुए समाज से इसे ऐतिहासिक बनाने का आह्वान किया।
अशोकनगर जैन समाज के अध्यक्ष राकेश कांसल ने चातुर्मास अवधि के दौरान जिला एवं पुलिस प्रशासन के सहयोग की सराहना की और कहा कि प्रशासनिक समर्थन से ही ऐसे धार्मिक आयोजन अनुशासित और भव्य रूप ले पाते हैं। इस अवसर पर नीलेश बड़कुल, नितिन, अक्षय अमरोद, सार्थक जैन सहित अनेक प्रमुख जनों ने महाराज श्री को श्रीफल भेंट कर कृतज्ञता व्यक्त की।
अपने प्रवचन में मुनि पुगंव श्री सुधासागरजी महाराज ने यह भी कहा कि तीर्थ वही नहीं जहां भगवान का जन्म हुआ हो, बल्कि जहां पंचकल्याणक जैसे महान उत्सव मनाए जाते हैं, वही भूमि तीर्थ बन जाती है। उन्होंने बताया कि जिन मंदिरों से हमारे पूर्वजों का संबंध रहा है, उनकी सेवा से न केवल आध्यात्मिक शांति मिलती है, बल्कि अनेक मानसिक और पारिवारिक दोष भी दूर होते हैं। मेला महोत्सव का यह आयोजन केवल उत्सव नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक चेतना और वृद्ध सम्मान की जीवंत घोषणा बनकर उभरा।

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Raju Atulkar
Author: Raju Atulkar

"पत्रकारिता सिर्फ पेशा नहीं, जिम्मेदारी भी है…" साल 2015 से कलम की स्याही से सच को उजागर करने की यात्रा जारी है। समसामयिक मुद्दों की बारीकियों को शब्दों में ढालते हुए समाज का आईना बनने की कोशिश। — राजू अतुलकर, तेजस रिपोर्टर डिजिटल

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