गर्भकल्याणक द्वितीय दिवस : “अपने दुख को दूसरों का दुख मत बनने दो” — मुनि श्री सुधासागरजी की देशना से गूंजा तीर्थोदय गोलाकोट

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📰 अतुल कुमार जैन
शिवपुरी | अति प्राचीन तीर्थोदय गोलाकोट में चल रहे विश्व शांति महा पंचकल्याणक महोत्सव के अंतर्गत गर्भकल्याणक उत्तरार्ध का द्वितीय दिवस धर्म, साधना और आत्मचिंतन का सशक्त मंच बनकर उभरा। परम पूज्य मुनि श्री पुगंव सुधासागरजी महाराज की ओजस्वी देशना ने हजारों श्रद्धालुओं को भाव-विभोर करने के साथ-साथ उनके जीवन-दृष्टिकोण पर गंभीर मंथन के लिए प्रेरित किया।

प्रातःकाल से ही तीर्थ परिसर में श्रद्धालुओं का अभूतपूर्व सैलाब उमड़ पड़ा। मंत्रोच्चार, भक्ति-संगीत और साधना की लय में पूरा क्षेत्र आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर दिखाई दिया।

द्वितीय दिवस की शुरुआत प्रातः 6:30 बजे मंगलाष्टक, दिगंबरधन, रक्षामंत्र, शांतिमंत्र, नित्य नियम, अभिषेक, शक्तिधारा पूजन (गर्भकल्याणक पूजन) और शांति हवन से हुई। विधिविधान के साथ संपन्न इन अनुष्ठानों में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने सहभागिता कर पुण्यलाभ अर्जित किया। वैदिक ऋचाओं के उच्चारण से पूरा परिसर भक्तिमय वातावरण में परिवर्तित हो गया।

आत्मनिर्भरता और आत्मबल का संदेश

प्रातः 8:30 बजे विशाल पंडाल में मुनि श्री की दिव्य देशना हुई। उन्होंने सरल किंतु गहन शब्दों में जीवन का मूल सत्य सामने रखा—
यह मत मानो कि हम किसी और के सहारे जीवित हैं। हर आत्मा अपने पुण्य और पुरुषार्थ से आगे बढ़ती है।
दुख के विषय पर उन्होंने अत्यंत संवेदनशील दृष्टिकोण रखते हुए कहा—
दुख बिना ब्याज का कर्ज है—आता है और चला जाता है। लेकिन यदि तुम्हारे दुख से कोई और दुखी हो जाए, तो वही दुख ब्याज सहित बढ़ने लगता है।

परिवार पर दुख का बोझ, सबसे बड़ी भूल

गृहस्थ जीवन का उदाहरण देते हुए मुनि श्री ने चेताया कि व्यक्ति अपने दुख का भार अनजाने में पूरे परिवार पर डाल देता है—
एक व्यक्ति बीमार होता है, लेकिन पूरा घर परेशान हो जाता है। एक की चिंता पूरे परिवार की नींद उड़ा देती है। यही स्थिति सबसे खतरनाक होती है।
उन्होंने भरोसा दिलाया कि असफलता, बीमारी और आर्थिक अभाव स्थायी नहीं होते—
बुखार उतरेगा, असफलता सफलता में बदलेगी, अभाव समाप्त होगा—दुविधाओं की उम्र बहुत कम होती है।

मृत्यु के समय का आत्ममंथन

मुनि श्री ने श्रोताओं के सामने एक गहरा प्रश्न रखा—
मरण के समय तुम्हें किस बात का दुख होगा—शरीर का, परिवार का, बच्चों का या संपत्ति का?
उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल आशीर्वाद से नहीं, बल्कि स्वयं के आचरण से ही समाधान संभव है—
मार्ग दिखाया जा सकता है, उस पर चलना स्वयं को ही पड़ेगा।
तत्वार्थ सूत्र के भावार्थ को उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा—
अपने दुख को इस प्रकार संभालो कि तुम्हारे कारण कोई दूसरा दुखी न हो—यही सच्चा धर्म है।
मध्याह्न 12:30 बजे सीमंतनी क्रियाएं संपन्न हुईं। महिला संगीत के माध्यम से माता की गोद भराई का भावपूर्ण दृश्य प्रस्तुत किया गया, जिसने उपस्थित जनसमूह को भाव-विभोर कर दिया।
दोपहर 2:20 बजे सत्येंद्र शर्मा एवं उनकी टीम द्वारा पंचकल्याणक से जुड़े प्रसंगों का नाट्य मंचन किया गया, जिसने दर्शकों को भावनात्मक रूप से जोड़ दिया।
दोपहर 3:00 बजे मंगल घट यात्रा के साथ नवीन मंदिर की शुद्धि, वेदी शुद्धि और शिखर शुद्धि सहित प्रतिष्ठा संबंधी सभी क्रियाएं विधिविधान से पूरी हुईं।

सायंकालीन आरती और रात्रि सभा

सायंकाल 5:30 बजे आचार्य भक्ति, जिज्ञासा समाधान और भव्य आरती का आयोजन हुआ। दीपों की जगमगाहट और भक्तिगीतों के बीच श्रद्धालुओं ने गहन श्रद्धा के साथ सहभागिता की।
रात्रि 7:30 बजे महाराजा नाभिराय के राजदरबार पर आधारित भव्य मंचन प्रस्तुत हुआ। माता मरूदेवी, सोलह स्वप्नों का वर्णन, उनका फलादेश, गीत-संगीत, नृत्य और एलईडी स्क्रीन पर स्वप्नों का सजीव चित्रण विशेष आकर्षण का केंद्र रहा।

विश्व शांति महा पंचकल्याणक महोत्सव का द्वितीय दिवस भक्ति, साधना और आत्मबोध की ऊंचाइयों को छूता हुआ संपन्न हुआ। प्रतिदिन बढ़ती श्रद्धालुओं की संख्या यह संकेत देती है कि तीर्थोदय गोलाकोट केवल आयोजन स्थल नहीं, बल्कि आत्मशांति और जीवन-दर्शन का जीवंत केंद्र बन चुका है।

मुनि श्री का संदेश पूरे वातावरण में गूंजता रहा—
“अपने दुख से किसी और को दुखी मत होने दो—यही जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।”
और यही वाक्य हर श्रद्धालु के मन में एक गहरा आत्मप्रश्न छोड़ गया।

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