स्मृति-शेष : एक युग, एक आदर्श – पूज्य पापाजी स्व. आलमचन्द्र जैन जी

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“व्यक्तित्व वे नहीं होते जो इतिहास में लिखे जाते हैं, व्यक्तित्व वे होते हैं जो अपनों के दिलों में सदैव धड़कते रहते हैं।”
आज 6 जून 2026, एक ऐसा दिन है जो हमारे परिवार के लिए स्तब्ध करने वाला तो है, परंतु साथ ही उस महान आत्मा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का भी अवसर है, जिसने हमारे जीवन को प्रेम, अनुशासन और धर्म के प्रकाश से आलोकित किया। आज हमारे पूज्य पापाजी स्व. आलमचन्द्र जैन जी की 7वीं पुण्यतिथि है। सात वर्ष बीत गए, लेकिन उनकी स्मृतियों की सुगंध आज भी हमारे घर के हर कोने और हमारे मन के हर विचार में बसी हुई है।

पापा जी का व्यक्तित्व किसी एक परिभाषा में नहीं समाता। वे एक ऐसे व्यक्ति थे जिनमें सरलता और गंभीरता का अद्भुत संतुलन था। उनका मिलनसार स्वभाव ऐसा था कि वे हर आयु वर्ग के लोगों के साथ एक अनोखा रिश्ता कायम कर लेते थे। घर के छोटे बच्चों के साथ वे स्वयं भी एक बच्चा बन जाते थे—उनकी हंसी में शामिल होना, उनके खेल में हिस्सा लेना, यह दर्शाता था कि उनका मन कितना निर्मल और सहज था।

वहीं दूसरी ओर, बड़ों और बुजुर्गों के साथ उनका व्यवहार अगाध सम्मान और सेवाभाव से भरा रहता था। वे उनके अनुभवों को अपना मार्गदर्शक मानते थे और उनके साथ घंटों बैठकर जीवन के सार को समझना पसंद करते थे। वे समाज के उन चुनिंदा लोगों में से थे जो दूसरों की उन्नति देखकर ईर्ष्या नहीं, बल्कि खुशी महसूस करते थे। किसी के भी अच्छे काम की तारीफ करना उनका स्वभाव था। वे बिना किसी स्वार्थ के लोगों का हौसला बढ़ाते थे, क्योंकि उन्हें लोगों को आगे बढ़ते हुए देखने में असली आनंद मिलता था।

उनके जीवन का एक अत्यंत पावन और प्रेरणादायक अध्याय उनकी ‘सम्मेद शिखरजी’ के प्रति निष्ठा थी। वे केवल तीर्थयात्री नहीं थे, वे भक्त थे। हर वर्ष सम्मेद शिखरजी की यात्रा करना उनके लिए कोई साधारण काम नहीं, बल्कि उनके जीवन का सबसे अनिवार्य और प्रिय संकल्प था। शिखर जी की पावन पहाड़ियों के प्रति उनका समर्पण, उस कठिन पदयात्रा में भी उनका उत्साह और वहां पहुँचकर मिलने वाली आध्यात्मिक शांति उनके व्यक्तित्व के उस हिस्से को दर्शाती है, जहाँ सांसारिक मोह-माया के ऊपर केवल परमात्मा का ध्यान था। आज भी, जब हम उन तीर्थों की चर्चा करते हैं, तो उनकी छवि हमारी आँखों के सामने साकार हो उठती है।

हमारे परिवार के लिए वे केवल एक मुखिया नहीं थे, वे हमारी नींव थे। उन्होंने हमें सिखाया कि कठिन समय में कैसे मुस्कुराना है और अपनों के साथ कैसे खड़ा रहना है। उनकी अनुपस्थिति का यह सातवाँ वर्ष हमें यह याद दिलाता है कि उन्होंने हमें विरासत में संपत्ति से ज्यादा ‘संस्कार’ दिए हैं। आज जो भी हम हैं, वे उन्हीं के द्वारा सिंचित आदर्शों के कारण हैं।

आज इस पुण्यतिथि पर, हम अश्रुपूरित नेत्रों से उन्हें नमन करते हैं। भले ही वे शारीरिक रूप से हमारे पास नहीं हैं, लेकिन उनकी सीख, उनका आशीर्वाद और उनके द्वारा तय किए गए धर्म के रास्ते पर हम निरंतर चल रहे हैं। हम ईश्वर से यही प्रार्थना करते हैं कि उनकी पुण्यात्मा को अपने श्रीचरणों में मोक्ष और अनंत शांति प्रदान करें।
उनके पदचिह्नों पर चलते हुए, हम स्वयं को धन्य मानते हैं कि हम उनकी संतान हैं।
विनम्र श्रद्धांजलि
स्मृति में समर्पित :

अतुल जैन, अनुज जैन
(एवं संपूर्ण चौधरी परिवार)


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PANKAJ JAIN
Author: PANKAJ JAIN

पत्रकारिता में 2009 से सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। "दैनिक अग्निबाण" में लंबी पारी के बाद "SCN NEWS" सहित कई संस्थानों में न्यूज़ डेस्क का नेतृत्व किया। वर्तमान में सा. "क्राइम अगेंस्ट न्यूज", दैनिक "तेजस रिपोर्टर" और कई डिजिटल प्लेटफार्म के संपादकीय प्रमुख हैं। सामाजिक सरोकारों, विशेषकर हाशिए पर खड़े वर्ग और अन्याय के मुद्दों पर लेखन में विशेष रुचि रखते हैं। इसके साथ ही "जिनोदय" और "पंकज का पंच" जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के निदेशक हैं, जो जनचेतना और वैचारिक संवाद को बढ़ावा देने का माध्यम हैं।

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