प्रतीक को नुकसान पहुंचाना – सांप्रदायिक सौहार्द पर एक प्रहार

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विशेष आलेख – कमलेश मीणा (भोपाल)
प्रस्तावना
श्रीनगर स्थित हजरतबल दरगाह में ईद-ए-मिलाद के अवसर पर राष्ट्रीय प्रतीक को नुकसान पहुँचाने की घटना न केवल एक संवैधानिक अपमान है, बल्कि यह देश की गंगा-जमुनी तहज़ीब और सांप्रदायिक सौहार्द पर भी एक गहरी चोट है। यह घटना केवल दरगाह की पवित्रता को नहीं, बल्कि मुस्लिम समुदाय की सामूहिक भावनाओं को भी आहत करती है। जम्मू-कश्मीर वक्फ बोर्ड की चेयरपर्सन डॉ. द्रख्शां अंद्राबी द्वारा इस घटना की तीव्र निंदा और इसे आतंकवादी कृत्य की संज्ञा देना इस बात को दर्शाता है कि यह एक सामान्य विरोध नहीं, बल्कि एक संगठित असहिष्णुता का संकेतक है।
घटना का विवरण:
ईद-ए-मिलाद की नम्रता और आध्यात्मिकता के माहौल में श्रीनगर की हजरतबल दरगाह में जब सैकड़ों की संख्या में लोग एकत्रित थे, तभी भीड़ के एक समूह ने हाल ही में किए गए रिनोवेशन के दौरान लगाए गए राष्ट्रीय प्रतीक को निशाना बनाना शुरू कर दिया। यह प्रतीक, जो भारतीय गणराज्य की संप्रभुता और एकता का प्रतिनिधित्व करता है, उसे दरगाह के भीतर लगाना कुछ लोगों को आपत्तिजनक लगा। धार्मिक भावना के नाम पर यह हिंसक विरोध धीरे-धीरे उग्र रूप ले बैठा और अंततः प्रतीक को क्षतिग्रस्त कर दिया गया।
प्रशासनिक और सामाजिक प्रतिक्रिया:
इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना के बाद डॉ. द्रख्शां अंद्राबी ने प्रेस वार्ता में इसे न सिर्फ दरगाह के अपवित्रीकरण के रूप में देखा, बल्कि इसे राष्ट्र विरोधी कृत्य करार दिया। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि इस तरह की हरकत करने वाले किसी आतंकवादी से कम नहीं हैं, और उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और सुरक्षा एजेंसियों से इस घटना में संलिप्त व्यक्तियों की शीघ्र गिरफ्तारी की मांग की।
उनकी भावनात्मक प्रतिक्रिया – “जैसे मुझ पर बादल फट पड़ा हो” – यह दर्शाती है कि एक राष्ट्रभक्त मुस्लिम महिला के लिए यह कृत्य केवल धार्मिक या राजनैतिक मुद्दा नहीं, बल्कि व्यक्तिगत आघात का विषय भी है।
मूल प्रश्न: क्या धार्मिक स्थानों में राष्ट्रीय प्रतीक का स्थान नहीं होना चाहिए?
यह बहस का विषय हो सकता है, लेकिन यह समझना आवश्यक है कि राष्ट्रीय प्रतीक किसी धर्म विशेष का नहीं होता। यह पूरे देश की एकता, अखंडता और गौरव का प्रतिनिधित्व करता है। धार्मिक स्थलों में यदि राष्ट्रीय प्रतीक को उचित सम्मान और स्थान मिलता है, तो यह इस बात का प्रमाण है कि आस्था और राष्ट्रभक्ति एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं।
हजरतबल दरगाह की यह घटना हमें चेताती है कि धर्म के नाम पर होने वाली उग्रता, चाहे वह किसी भी पक्ष से हो, न केवल समाज की स्थिरता को खतरे में डालती है, बल्कि देश की साझा विरासत को भी खंडित करती है। इस प्रकार की घटनाओं पर कठोरता से कार्रवाई की जानी चाहिए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि भारत जैसे विविधता भरे देश में धार्मिक आस्था और राष्ट्रीय एकता के बीच संतुलन बना रहे।
इस घटना को केवल एक प्रतीक तोड़ने की घटना के रूप में देखना एक बड़ी भूल होगी। यह उन शक्तियों का प्रतिनिधित्व करती है जो समाज में उन्माद और विघटन फैलाना चाहती हैं। ऐसे में हमारा कर्तव्य है कि हम सतर्क रहें, सजग रहें और मिलकर अपने साझा मूल्यों की रक्षा करें।

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Raju Atulkar
Author: Raju Atulkar

"पत्रकारिता सिर्फ पेशा नहीं, जिम्मेदारी भी है…" साल 2015 से कलम की स्याही से सच को उजागर करने की यात्रा जारी है। समसामयिक मुद्दों की बारीकियों को शब्दों में ढालते हुए समाज का आईना बनने की कोशिश। — राजू अतुलकर, तेजस रिपोर्टर डिजिटल

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