हर साल 26 जनवरी को पूरे देश में गणतंत्र दिवस के रूप में बड़े उत्साह और गर्व के साथ मनाया जाता है। यह वही ऐतिहासिक दिन है, जब भारत का संविधान औपचारिक रूप से लागू हुआ और देश ने खुद को एक संप्रभु, लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया। इसी दिन डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने भारत के पहले राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली थी।
आज देश 76वां गणतंत्र दिवस मानने जा रहा है।
लेकिन क्या आप जानते हैं कि पहला गणतंत्र दिवस वर्तमान समय से बिल्कुल अलग तरीके से मनाया गया था? आइए, जानते हैं उस ऐतिहासिक दिन की दिलचस्प कहानी और पहली बार गणतंत्र दिवस के आयोजन से जुड़े अनछुए पहलू।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली
Republic Day 2025 : 26 जनवरी 1950 को भारत ने एक नए युग की शुरुआत की। इसी दिन देश ने अपने संविधान को लागू कर खुद को एक गणराज्य के रूप में स्थापित किया। इस ऐतिहासिक अवसर पर डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने भारत के पहले राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली, और भारत का तिरंगा गर्व से लहराया। इस दिन की विशेषता केवल संविधान के लागू होने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की आत्मनिर्भरता और लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्धता का प्रतीक भी है।

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1950 का गणतंत्र दिवस : जब पहली बार भारत ने खुद को गणराज्य घोषित किया
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पहली परेड से लेकर संविधान लागू होने तक, जानें गणतंत्र दिवस की दिलचस्प कहानी
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कर्तव्य पथ से पहले कहां हुआ था पहला गणतंत्र दिवस? जानें अनसुने किस्से
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पहला तिरंगा फहराने के दौरान डॉ. राजेंद्र प्रसाद अश्वारोही रथ पर राष्ट्रपति भवन से इरविन एम्पिथिएटर तक पहुंचे थे।
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संविधान को तैयार करने में कुल 2 साल, 11 महीने और 18 दिन लगे थे।
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गणतंत्र दिवस परेड में हर साल एक विदेशी मेहमान मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होता है, जो भारत की वैश्विक मित्रता का प्रतीक है।
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गणतंत्र दिवस का जश्न मनाइए और अपने कर्तव्यों को याद कीजिए, क्योंकि यही इस दिन का असली संदेश है।
संविधान निर्माण : एक सुनहरा अध्याय
15 अगस्त 1947 को भारत ने ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता पाई, लेकिन संविधान के अभाव में देश अभी भी ब्रिटिश कानूनों पर निर्भर था। 9 दिसंबर 1946 को संविधान सभा की स्थापना की गई, जिसकी अध्यक्षता डॉ. भीमराव अंबेडकर ने की। उनके नेतृत्व में 26 नवंबर 1949 को संविधान का मसौदा तैयार हुआ।

तारीख 26 जनवरी 1950, समय सुबह 10 बजकर 18 मिनट। यह वो ऐतिहासिक घड़ी थी जब देश के पहले भारतीय गवर्नर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने भारत को एक संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया था. साल 1947 में भारत अंग्रेजों की गुलामी से आजाद हुआ था. वहीं, साल 1950 की 26 जनवरी को भारतीय संविधान लागू होने के बाद, भारत एक गणराज्य राज्य बना था. गणराज्य मतलब वो राज्य जिसका शासन नागरिकों के चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा किया जाता है।
इस दिन को चुने जाने का कारण था 26 जनवरी 1930 को “पूर्ण स्वराज” की घोषणा का ऐतिहासिक महत्व।
पहला गणतंत्र दिवस : कहां हुआ था आयोजन?

पहला गणतंत्र दिवस आज के कर्तव्य पथ (राजपथ) पर नहीं, बल्कि इरविन एम्पिथिएटर में मनाया गया था, जिसे अब मेजर ध्यानचंद स्टेडियम कहा जाता है। इस आयोजन में लगभग 3,000 लोगों ने हिस्सा लिया, और 100 से अधिक विमानों ने भारतीय वायुसेना की ताकत का प्रदर्शन किया। इसके बाद अगले कुछ वर्षों तक रामलीला मैदान, इरविन स्टेडियम और लाल किले जैसे स्थानों पर गणतंत्र दिवस समारोह आयोजित किया गया।
कौन बना पहला मुख्य अतिथि

भारत के पहले गणतंत्र दिवस (26 जनवरी 1950) के ऐतिहासिक अवसर पर इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था। मुख्य अतिथि का चयन बड़े विचार-विमर्श और रणनीतिक दृष्टिकोण से किया जाता है, क्योंकि यह भारत की कूटनीतिक और सांस्कृतिक संबंधों को प्रदर्शित करता है। गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि का सम्मान करना भारत का सर्वोच्च आदर-सूचक है। इस मौके पर उन्हें 21 तोपों की सलामी दी जाती है, राष्ट्रपति भवन के सामने गार्ड ऑफ ऑनर दिया जाता है, और शाम को राष्ट्रपति द्वारा उनके सम्मान में एक विशेष रिसेप्शन का आयोजन किया जाता है।
सलामी 31 तोपों की
गणतंत्र दिवस पर तोपों की सलामी हमारी परंपरा का एक अनमोल हिस्सा है, जो राष्ट्र के प्रति सम्मान और गौरव का प्रतीक है। वर्तमान में, राष्ट्रगान के आरंभ से समापन तक 21 तोपों की सलामी दी जाती है, जो राजकीय आदर का एक प्रमुख तरीका है। लेकिन क्या आप जानते हैं, गणतंत्र दिवस के पहले वर्ष में भारत के राष्ट्रपति को 31 तोपों की सलामी दी गई थी?

उस समय 31 तोपों की सलामी को शाही सम्मान का प्रतीक माना जाता था। समय के साथ इस परंपरा में बदलाव हुआ, और 21 तोपों की सलामी को राष्ट्रीय सम्मान के रूप में स्थापित कर दिया गया। यह बदलाव न केवल हमारी परंपरा के विकास को दर्शाता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि सम्मान के प्रतीकों में समय के साथ कैसे नयापन और सामंजस्य जोड़ा गया है।
जब शाही बग्गी के लिए उछाला गया सिक्का
1950 के गणतंत्र दिवस पर, जब भारत के राष्ट्रपति शाही बग्गी में समारोह स्थल पर पहुंचे, तो यह नज़ारा शान और गरिमा का प्रतीक था। लेकिन इस बग्गी के पीछे एक दिलचस्प कहानी छुपी हुई थी। यह बग्गी पहले अंग्रेज वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन की सवारी हुआ करती थी।

1947 में भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के दौरान जब संपत्ति के बंटवारे की बात आई, तो सवाल उठा कि शाही बग्गी का हकदार कौन होगा। दोनों देशों के बीच इसे लेकर विवाद खड़ा हो गया। किसी नतीजे पर न पहुंच पाने के बाद, मामला किस्मत के हाथों सौंपने का निर्णय लिया गया।

फैसला करने के लिए एक सिक्का उछालने की तरकीब निकाली गई। भारत की ओर से कमांडर-मेजर गोविंद सिंह और पाकिस्तान की ओर से कमांडर-मेजर याकूब खां को बुलाया गया। सबकी निगाहें सिक्के पर टिकी थीं। जब सिक्का ज़मीन पर गिरा, तो किस्मत ने भारत का साथ दिया।

इस तरह, वह शाही बग्गी भारत के हिस्से में आई और राष्ट्रपति की शान बन गई। आज भी, वह बग्गी भारत के गणतंत्र का एक ऐतिहासिक प्रतीक है, जो न केवल भारत की गरिमा को दर्शाती है, बल्कि किस्मत और इतिहास के अनोखे खेल की याद भी दिलाती है।
2025 में 76वां गणतंत्र दिवस

इस वर्ष, भारत अपना 76वां गणतंत्र दिवस मना रहा है। यह दिन न केवल संविधान की शक्ति को याद करने का अवसर है, बल्कि देश के विकास, शांति और एकता का भी प्रतीक है। कर्तव्य पथ पर हर साल की तरह इस बार भी परेड में सेना, झांकियां और सांस्कृतिक कार्यक्रम दर्शकों का मन मोह लेंगे।
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