चंद्रशेखर आज़ाद, ‘बमतुल बुखारा’ और खनियाधाना का छुपा इतिहास: जब महानायक ने बिताया था अज्ञातवास शिवपुरी की धरती पर

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विशेष रिपोर्ट – अतुल कुमार जैन
शिवपुरी | जिले का एक शांत, पहाड़ी और ऐतिहासिक कस्बा – खनियाधाना, केवल धरोहरों और राजशाही के किस्सों के लिए ही नहीं, बल्कि भारत के महानतम क्रांतिकारियों में से एक चंद्रशेखर आज़ाद के गुप्त अज्ञातवास के लिए भी जाना जाता है। वह आज़ाद जिन्होंने “मैं आज़ाद हूँ, आज़ाद रहूँगा” कहते हुए देश की आज़ादी के लिए जान न्योछावर कर दी, उन्होंने अपने जीवन का एक अहम और रणनीतिक समय खनियाधाना में बिताया।
खनियाधाना – स्वातंत्र्य समर का अनकहा अध्याय
प्राचीन राजवंशों की वीरभूमि खनियाधाना ने न केवल युद्धों और संघर्षों को जिया है, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम की अनगिनत कहानियाँ भी समेटी हैं। यहाँ के राजा खलकसिंह जूदेव न केवल राष्ट्रभक्त थे, बल्कि उन्होंने क्रांतिकारियों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से सहायता भी दी थी। एक समय अंग्रेजों ने जब उन्हें सत्ताच्युत कर दिया था, तो छप्पन गाँवों के किसानों ने खेती बंद कर दी थी – यह था उनका मौन सत्याग्रह, जो दो वर्षों तक चला और अंततः अंग्रेजों को झुकना पड़ा।
मैकेनिक के वेश में आज़ाद की एंट्री
कहानी शुरू होती है एक कार से। राजा खलक सिंह की रोल्स रॉयस गाड़ी की मरम्मत के लिए झांसी के बुंदेलखंड गैराज से एक ‘मैकेनिक’ साथ आया। रास्ते में एक साँप ने राजा पर हमला करने की कोशिश की, तभी वह मैकेनिक बिना हिचकिचाए अपनी तमंचा निकालकर साँप को मार गिराता है। अचूक निशाना देख राजा खलकसिंह चौक गए और शक के चलते मैकेनिक को एकांत में बुलाकर पूछा -“कौन हो तुम?”
मैकेनिक ने पहचान बताई:
वह और कोई नहीं, क्रांति की ज्वाला – चंद्रशेखर आज़ाद थे।
गोविंद बिहारी मंदिर में आज़ाद का अज्ञातवास
इस रहस्योद्घाटन के बाद, खलक सिंह जूदेव ने आज़ाद को गोविंद बिहारी मंदिर में छद्म रूप में एक पुजारी के रूप में रख लिया, नया नाम दिया गया – पंडित हरिशंकर शर्मा। यहाँ वे करीब 6-7 महीने रहे, रात को मंदिर में रुकते और दिन में 3 किलोमीटर दूर सीतापाठा की पहाड़ी पर जाकर बमों के परीक्षण करते, साथ ही अपने साथियों को हथियार चलाने की ट्रेनिंग देते।
उनके सहयोगी – मास्टर रुद्रनारायण, सदाशिव मलकापुरकर और भगवानदास माहौर – भी यहाँ आते रहे। राजा खलकसिंह उन्हें बम बनाने का सामान और शस्त्र उपलब्ध कराते रहे।
आज भी सीतापाठा की चट्टानों पर बम परीक्षण के निशान मौजूद हैं, हालांकि देखभाल के अभाव में ये निशान धीरे-धीरे मिटते जा रहे हैं।
आज़ाद के सेवक बने नाथूराम
उन दिनों नाथूराम छापकार नामक 12 वर्षीय बालक आज़ाद की सेवा में नियुक्त था, जो बाद में जीवन भर सीतापाठा के पास साधु बनकर रहा। वहीं, राजा खलकसिंह भी आज़ाद की शहादत के बाद एक तरह से सन्यासी जीवन जीने लगे और अंततः 1935 में महल त्याग कर बसई के राममंदिर में बस गए।
जब आज़ाद ने तस्वीर बनवाई और मिला ‘बमतुल बुखारा’

जो ऐतिहासिक तस्वीर आज हम देखते हैं जिसमें आज़ाद मूंछों पर ताव देते हुए नजर आते हैं — वह खलकसिंह के चित्रकार मम्मा जू द्वारा बनाई गई थी। शुरुआत में आज़ाद ने तस्वीर खिंचवाने से मना कर दिया था, लेकिन जूदेव के आग्रह पर तैयार हुए।
इस तस्वीर में आज़ाद की कमर में बंधी एक खास पिस्तौल भी दिखती है -जिसे वो प्यार से ‘बमतुल बुखारा’ कहते थे। यह पिस्तौल भी राजा खलकसिंह ने अंग्रेजों से अनुमति लेकर राज्य के शस्त्रागार में दर्ज करवाई थी। दो एक जैसी रिवॉल्वरें खरीदी गईं — एक रिकार्ड में दर्ज होकर ‘नदी में गिर जाने’ की झूठी सूचना के साथ गायब कर दी गई और दूसरी आज़ाद को सौंप दी गई।
वही ‘बमतुल बुखारा’ आज प्रयागराज म्यूजियम में संरक्षित है आज़ाद की वीरता की मूक गवाह बनकर।
इतिहास मिट रहा है… और जिम्मेदार कौन?

सीतापाठा की चट्टानों पर आज़ाद के परीक्षणों के निशान, गोविंद बिहारी मंदिर, बसई रेस्टहाउस, वो रोजनामचे, वो स्मृतियाँ — आज संरक्षण के अभाव में धीरे-धीरे मिट रही हैं। इतिहास का वह सुनहरा पन्ना जो खनियाधाना के गर्व से जुड़ा है, वह सरकारी उपेक्षा और आमजन की उदासीनता के चलते खो रहा है।
यह ज़रूरी है कि शासन और स्थानीय प्रशासन इस ऐतिहासिक धरोहर को संरक्षित करें। खनियाधाना में ‘चंद्रशेखर आज़ाद स्मृति स्थल’ की स्थापना हो, सीतापाठा बम परीक्षण स्थल को संरक्षित किया जाए और आज़ाद की यादों को संग्रहालय के रूप में संजोया जाए।
शिवपुरी की यह भूमि सिर्फ शिकारगाह नहीं, बल्कि एक विचार की शरणभूमि रही है। वह विचार, जो क्रांति की आग में तपकर भारत की आज़ादी का हिस्सा बना। हमें न केवल आज़ाद को याद करना चाहिए, बल्कि उनके छिपे पड़े पन्नों को उजागर करना चाहिए — क्योंकि यह इतिहास सिर्फ किताबों में नहीं, ज़मीन पर दर्ज है।

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Raju Atulkar
Author: Raju Atulkar

"पत्रकारिता सिर्फ पेशा नहीं, जिम्मेदारी भी है…" साल 2015 से कलम की स्याही से सच को उजागर करने की यात्रा जारी है। समसामयिक मुद्दों की बारीकियों को शब्दों में ढालते हुए समाज का आईना बनने की कोशिश। — राजू अतुलकर, तेजस रिपोर्टर डिजिटल

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