राकेश कुमार जैन
मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में स्थित रायसेन किला न केवल अपने ऐतिहासिक और स्थापत्य महत्व के लिए जाना जाता है, बल्कि यहां स्थित सोमेश्वर महादेव मंदिर भी अत्यंत श्रद्धेय है। यह अनूठा मंदिर वर्ष में सिर्फ एक दिन—महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर ही भक्तों के लिए खोला जाता है, जबकि शेष वर्ष इसके द्वार बंद रहते हैं। इस विशेष परंपरा को लेकर लंबे समय से बहस जारी है, और श्रद्धालु अब इसे नियमित रूप से खोलने की मांग कर रहे हैं।
इतिहास और धार्मिक महत्व

करीब 1500 फीट ऊंची पहाड़ी पर विस्तारित यह भव्य किला लगभग दस वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। ऐतिहासिक संदर्भों के अनुसार, इसका निर्माण 11वीं शताब्दी के आसपास हुआ था। किले के भीतर स्थित सोमेश्वर महादेव मंदिर में भगवान शिव की प्राचीन प्रतिमा स्थापित है, जहां श्रद्धालु हर साल महाशिवरात्रि पर उमड़ते हैं।

1974 में, स्थानीय लोगों ने मंदिर के ताले खोलने और शिवलिंग की पुनः प्राण-प्रतिष्ठा के लिए एक बड़ा आंदोलन छेड़ा था।

जनता के इस दबाव के चलते, तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाशचंद्र सेठी ने मंदिर के पट खोलने का निर्णय लिया, जिसके बाद से महाशिवरात्रि के दिन यह मंदिर श्रद्धालुओं के लिए खोला जाने लगा। इस अवसर पर यहां विशाल मेला भी आयोजित किया जाता है।
मंदिर के द्वार हमेशा खोलने की मांग क्यों?

हाल के वर्षों में, प्रसिद्ध कथावाचक पंडित प्रदीप मिश्रा ने अपनी कथाओं में इस मंदिर को वर्षभर के लिए खोलने की मांग उठाई है। उनकी इस पहल के बाद, मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती भी मंदिर में गंगाजल से अभिषेक करने पहुंची थीं। हालांकि, पुरातत्व विभाग के नियमों के कारण मंदिर के ताले नहीं खोले जा सके, और उन्हें गंगाजल रायसेन के तत्कालीन कलेक्टर को सौंपना पड़ा।

स्थानीय लोगों का कहना है कि यह धार्मिक स्थल जनता की आस्था का केंद्र है, और इसे सिर्फ एक दिन के लिए खोलना अनुचित है। इसी संदर्भ में “चलो रायसेन की ओर” जैसे आंदोलनों के माध्यम से लोग अपनी आवाज बुलंद करते रहे हैं।
महाशिवरात्रि का भव्य आयोजन
हर साल महाशिवरात्रि पर जैसे ही मंदिर के द्वार खुलते हैं, हजारों भक्त भगवान शिव के दर्शन और पूजन के लिए एकत्रित होते हैं। इस दिन किले की पहाड़ी पर विशाल मेले का आयोजन होता है, जहां धार्मिक अनुष्ठानों के साथ-साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं।

यह मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह भारत की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।








