सांख्य सागर झील में जलकुंभी संकट : हाईकोर्ट ने गठित की तीन सदस्यीय समिति, एडवोकेट निपुण सक्सेना ने रखा प्रभावी पक्ष

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रिपोर्ट-अतुल कुमार जैन
शिवपुरी | ग्वालियर हाईकोर्ट की डबल बेंच ने माधव राष्ट्रीय उद्यान में स्थित सांख्य सागर झील में तेजी से फैल रही जलकुंभी की समस्या को गंभीरता से लेते हुए तीन सदस्यीय कमेटी के गठन का निर्देश दिया है। यह कमेटी झील की वर्तमान स्थिति की समीक्षा कर अपनी विस्तृत रिपोर्ट हाईकोर्ट को सौंपेगी।
इस मामले में याचिका सामाजिक कार्यकर्ता आदित्य राज पांडे ने दायर की थी, जिनकी ओर से युवा अधिवक्ता निपुण सक्सेना ने प्रभावी ढंग से पक्ष रखा। याचिकाकर्ता ने कोर्ट को अवगत कराया कि सांख्य सागर झील, जिसे अंतरराष्ट्रीय महत्व की रामसर साइट का दर्जा प्राप्त है, जलकुंभी की अनियंत्रित वृद्धि से संकट में है। इस वनस्पति के कारण जलाशय का पारिस्थितिकी संतुलन बिगड़ रहा है और जलचर जीव-जंतु प्रभावित हो रहे हैं।
याचिका में मध्यप्रदेश सरकार, वन विभाग, शिवपुरी कलेक्टर और नगर पालिका को प्रतिवादी बनाया गया और झील के संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाने की मांग की गई। हाईकोर्ट में प्रतिवादी पक्ष के वकीलों ने दलील दी कि झील की सफाई के लिए आवश्यक प्रयास किए जा रहे हैं, जिसमें वाटर हार्वेस्टर का उपयोग भी शामिल है।

फोटो व दस्तावेजों से कोर्ट में रखे गए पुख्ता प्रमाण

हालांकि, एडवोकेट निपुण सक्सेना ने प्रतिवादी पक्ष की दलीलों को खारिज करते हुए झील की मौजूदा स्थिति को उजागर करने वाले फोटो और दस्तावेज कोर्ट के समक्ष पेश किए। उन्होंने बताया कि झील में जलकुंभी का अंबार लगा हुआ है और सफाई का कोई प्रभावी कार्य नहीं हुआ है। इस पर हाईकोर्ट ने मौके की स्थिति स्पष्ट करने के लिए तीन सदस्यीय जांच समिति गठित करने का आदेश दिया।

विशेषज्ञों की समिति करेगी निरीक्षण और रिपोर्ट सौंपेगी

न्यायालय के निर्देशानुसार गठित इस समिति में ग्वालियर स्थित राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर, वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश दीक्षित और सुनील जैन को शामिल किया गया है। यह समिति जल्द ही झील का दौरा कर वास्तविक स्थिति की रिपोर्ट हाईकोर्ट में पेश करेगी।

संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत

सांख्य सागर झील माधव राष्ट्रीय उद्यान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में इसकी अहम भूमिका है। जलकुंभी जैसी जलविद्युत अवरोधक वनस्पतियां पानी की गुणवत्ता को खराब कर देती हैं, ऑक्सीजन की मात्रा कम कर देती हैं और जलीय जीवों के लिए खतरा बन जाती हैं। यदि समय रहते आवश्यक कदम नहीं उठाए गए तो यह झील अपने प्राकृतिक अस्तित्व को खो सकती है।

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