बालाजी या जैन तीर्थंकर? दशकों से चढ़ाया जा रहा था चोला, लेकिन खुदाई में हुआ खुलासा

SHARE:

Report : Online Desk
Rajsthan News | राजस्थान के झालावाड़ जिले से एक हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है। पनवाड़ कस्बे में स्थित शीतला माता मंदिर में दशकों से जिस प्रतिमा की पूजा बालाजी के रूप में की जा रही थी, वह वास्तव में जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर की प्रतिमा निकली। मंदिर के जीर्णोद्धार के दौरान इस अद्भुत रहस्य से पर्दा उठा, जिससे न केवल स्थानीय ग्रामीण बल्कि पूरा क्षेत्र चौंक उठा।
खुदाई में हुआ बड़ा खुलासा :
ग्रामीणों के अनुसार, शीतला माता मंदिर में स्थापित इस प्रतिमा का निचला हिस्सा जमीन के अंदर दबा हुआ था। दशकों से यह प्रतिमा बजरंगबली की समझकर पूजी जा रही थी। जब जीर्णोद्धार के लिए खुदाई की गई और प्रतिमा को पूरी तरह साफ किया गया, तो सामने आया कि यह प्रतिमा भगवान महावीर की है। यह खड्गासन अवस्था में थी, जो जैन तीर्थंकरों की पारंपरिक मुद्रा है।
अन्य जैन अवशेष भी मिले :
प्रतिमा के आसपास के क्षेत्र में खुदाई के दौरान अन्य जैन प्रतिमाएं और अवशेष भी प्राप्त हुए। इनमें से कई प्रतिमाएं पद्मासन मुद्रा में मिली हैं, जो जैन धर्म के प्राचीन महत्व को दर्शाती हैं। इन अवशेषों ने यह संकेत दिया कि इस क्षेत्र में पहले कभी जैन मंदिर या स्थल मौजूद रहा होगा।
जैन समुदाय का बढ़ा आगमन :
खबर फैलते ही पनवाड़ और आसपास के इलाकों से जैन समुदाय के लोग बड़ी संख्या में यहां पहुंचने लगे। भगवान महावीर की प्रतिमा और अन्य अवशेषों की खोज ने इस स्थान को धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बना दिया है।
प्रसिद्ध जैन तीर्थ चांदखेड़ी से संबंध :
पनवाड़ से कुछ ही दूरी पर प्रसिद्ध चांदखेड़ी जैन तीर्थ स्थित है, जिसकी पहचान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर है। झालावाड़ और झालरापाटन में भी जैन धर्म के कई प्राचीन मंदिर और प्रतिमाएं हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह क्षेत्र कभी जैन धर्म का एक प्रमुख केंद्र रहा होगा।
जैन धर्म: प्राचीनतम संस्कृति का प्रतीक :
जैन धर्म, जिसे श्रमण संस्कृति के नाम से भी जाना जाता है, विश्व की प्राचीनतम और शाश्वत परंपराओं में से एक मानी जाती है। यह धर्म सृष्टि के प्रारंभ से ही अस्तित्व में है और इसे सनातन धर्म के रूप में देखा जाता है। यही कारण है कि भारत के विभिन्न हिस्सों में जैन धर्म से जुड़े प्राचीन अवशेष और प्रतिमाएं आज भी बड़ी संख्या में प्राप्त होती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि विश्व में धार्मिक स्थापत्य कला और मूर्ति निर्माण की परंपरा की शुरुआत जैन धर्म से ही हुई थी। जैन धर्म की यह प्राचीन परंपरा इतनी प्रभावशाली थी कि बाद में अस्तित्व में आए अन्य धर्म और संप्रदायों ने इसका अनुसरण किया। यही वजह है कि जैन धर्म के जितने प्रमाण, प्रतिमाएं, और स्थापत्य अवशेष प्राप्त होते हैं, उतनी किसी अन्य धर्म या संस्कृति से संबंधित नहीं मिलतीं।
यह तथ्य न केवल जैन धर्म की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता को रेखांकित करता है, बल्कि इसके गहरे दार्शनिक और आध्यात्मिक मूल्यों को भी उजागर करता है। जैन धर्म की अहिंसा, तपस्या, और सत्य की शिक्षाएं इसकी स्थायित्व और व्यापकता का आधार रही हैं।
प्रतिमा की पहचान :
मीडिया रिपोर्ट्स में जैन धर्म के 24वे तीर्थंकर भगवान महावीर की प्रतिमा बताया जा रहा है। लेकिन यह प्रतिमा जैन धर्म के 23 वे तीर्थंकर पार्श्वनाथ की प्रतीत होती है।
अंततः, प्रतिमा की सटीक पहचान के लिए विशेषज्ञों द्वारा प्रतिमा के विशिष्ट लक्षणों, चिह्नों और शैलीगत विशेषताओं का गहन अध्ययन आवश्यक है, जिससे यह निर्धारित किया जा सके कि यह भगवान महावीर की है या भगवान पार्श्वनाथ की।

ये ख़बर आपने पढ़ी देश के तेजी से बढ़ते सबसे लोकप्रिय हिंदी न्यूज़ प्लेटफ़ॉर्म 🖱️www.tejasreporter.com पर

📱आज तेजी से बदलते परिवेश में जहां हर क्षेत्र का डिजिटलीकरण हो रहा है, ऐसे में 📰 “दैनिक तेजस रिपोर्टर” www.tejasreporter.com सटीक समाचार और तथ्यात्मक रिपोर्ट्स लेकर आधुनिक तकनीक से लैस अपने डिजिटल प्लेटफार्म पर प्रस्तुत है। अपने निडर, निष्पक्ष, सत्य और सटीक लेखनी के साथ मैं पंकज जैन ✍🏻 और मेरे सहयोगी अब ⏱️24X7 आप तक देश विदेश की महत्वपूर्ण खबरों को पहुंचाने के लिए कटिबद्ध हैं।
सभी अपडेट्स व नोटिफिकेशन प्राप्ति के लिए नीचे दिए गए बेल आइकन पर क्लिक कर अभी सब्सक्राइब करें।
Tejas Reporter
Author: Tejas Reporter

Join us on:

सबसे ज्यादा पड़ गई