📰 अतुल कुमार जैन
गोला कोट (खनियाधाना) | अतिशयकारी तीर्थ क्षेत्र गोलाकोट में राष्ट्रसंत निर्यापक श्रमण मुनि पुगंव श्री सुधासागरजी महाराज ससंघ के पावन सान्निध्य तथा प्रतिष्ठाचार्य प्रदीप भैया एवं मुकेश भैया के निर्देशन में आयोजित श्री मद् जिनेन्द्र पंच कल्याणक प्रतिष्ठा महा महोत्सव एवं विश्व शांति महायज्ञ (गजरथ महोत्सव) का आज गरिमामय समापन हुआ। इस अवसर पर तीर्थ क्षेत्र में गजरथ सहित तीन-तीन रथों का भव्य प्रवर्तन किया गया, जिसने पूरे परिसर को भक्ति और उल्लास से भर दिया। इसके पश्चात महोत्सव के विभिन्न पात्रों का समिति द्वारा सम्मान किया गया।

विशाल धर्मसभा में जीवन-दर्शन की सशक्त देशना
समापन से पूर्व आयोजित विशाल धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि पुगंव श्री सुधासागरजी महाराज ने जीवन के सूक्ष्म संकेतों को सरल उदाहरणों से स्पष्ट किया।

उन्होंने कहा कि जैसे भोजन करते समय थोड़ी देर बाद ही मन भर जाता है, या हिल स्टेशन की यात्रा में जाने से अधिक जल्दी लौटने की इच्छा होने लगती है—वैसे ही जब मन में ‘विराम’ का भाव स्वतः जागने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि परिवर्तन निकट है।

उन्होंने चेताया कि अच्छे कार्यों के प्रति भी यदि मन में “कब तक?” का भाव आ जाए, तो वह संकेत है कि साधना में ढिलाई आ रही है। यही भाव यदि सांसारिक विषयों के प्रति जाग जाए, तो संसार से विरक्ति का द्वार खुलता है।
बुरी आदतों से विराम का मार्ग
मुनिश्री ने आत्ममंथन का सूत्र देते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति में कोई न कोई कमी होती है। उसे पहचानकर संकल्प के साथ विराम करना ही साधना है।
“एक बार मन से यह भाव उठे—‘हे प्रभु, इस बुरी आदत का आज विराम हो’—तो देखना, वही बीज विराम में परिवर्तित हो जाता है।”
उन्होंने बताया कि जब धन स्वयं नहीं चाहिए, तभी चारों ओर से आता है; और जब मन में विराम का भाव दृढ़ हो जाता है, तभी वास्तविक शांति मिलती है।
निंदा से नहीं, प्रशंसा से थकने का अभ्यास
मुनिश्री ने समाज को नई दृष्टि देते हुए कहा—
“निंदा से हम सब थक जाते हैं; कभी प्रशंसा से थकने का प्रयास करें।”

उन्होंने जोड़ा कि यदि मंदिर जाने, दान देने या साधना करने में मन में ‘कब तक’ का भाव आ जाए, तो वह चेतावनी है। साधना का पक्ष जितना बढ़ेगा, संसार उतना ही छोटा पड़ता जाएगा—और यही शीघ्र पूर्णता का संकेत है।
गजरथ महोत्सव की गौरव-गाथा
मध्यप्रदेश महासभा संयोजक विजय धुर्रा ने कहा कि आज श्रमण संस्कृति संस्थान को भी गर्व है, क्योंकि उसके विद्वानों ने गजरथ महोत्सव की सम्पूर्ण गौरव-गाथा का सस्वर गान किया।

अमित शास्त्री, जय शास्त्री और शुभम् शास्त्री द्वारा निरंतर गान ने वातावरण को भाव-विभोर कर दिया।
सवा करोड़ मंत्रों से आहुतियां, शांति का संकल्प
महोत्सव का समापन मुनिश्री के आशीर्वाद और प्रतिष्ठाचार्य प्रदीप भैया के मार्गदर्शन में हुआ। इसके पश्चात महायज्ञ नायक सतेन्द्र जैन (राजधानी, दिल्ली), सौधर्म इन्द्र की भूमिका में राकेश जी, कुबेर इन्द्र पीयूष जैन (दिल्ली), अमित जैन एवं एस.के. जैन (दिल्ली) सहित प्रमुख पात्रों ने तीर्थंकर कुंड, अरिहंत कुंड और गंधधर कुंड में सवा करोड़ मंत्रों के उच्चारण के साथ आहुतियां समर्पित कीं। विश्व शांति, लोक-कल्याण और आत्मशुद्धि का सामूहिक संकल्प लिया गया।

गोलाकोट का यह समापन केवल एक आयोजन का अंत नहीं, बल्कि विराम, विवेक और वैराग्य के संदेश का विस्तार है। प्रश्न यही है—
क्या हम अपने भीतर उठते ‘विराम’ के संकेतों को पहचानकर उन्हें साधना में बदल पाएँगे?
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Author: PANKAJ JAIN
पत्रकारिता में 2009 से सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। "दैनिक अग्निबाण" में लंबी पारी के बाद "SCN NEWS" सहित कई संस्थानों में न्यूज़ डेस्क का नेतृत्व किया। वर्तमान में सा. "क्राइम अगेंस्ट न्यूज", दैनिक "तेजस रिपोर्टर" और कई डिजिटल प्लेटफार्म के संपादकीय प्रमुख हैं। सामाजिक सरोकारों, विशेषकर हाशिए पर खड़े वर्ग और अन्याय के मुद्दों पर लेखन में विशेष रुचि रखते हैं। इसके साथ ही "जिनोदय" और "पंकज का पंच" जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के निदेशक हैं, जो जनचेतना और वैचारिक संवाद को बढ़ावा देने का माध्यम हैं।







