बेटी के जन्म पर बदली सोच की तस्वीर: सिरसौद गांव से उठा गर्व और बराबरी का संदेश

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रिपोर्ट – अतुल कुमार जैन
शिवपुरी | करैरा विधानसभा क्षेत्र के सिरसौद गांव से सामने आई एक सकारात्मक और प्रेरक घटना ने समाज की जड़ जमाई मानसिकता को चुनौती दी है। जहां आज भी कई इलाकों में बेटी के जन्म को चुप्पी और उपेक्षा से जोड़कर देखा जाता है, वहीं इस गांव में एक पिता ने इसे खुले उत्सव और आत्मगौरव का विषय बना दिया।
गांव निवासी संजीव लोधी के घर दूसरी बेटी के जन्म ने केवल परिवार ही नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र को खुशियों से भर दिया। शुक्रवार शाम करीब छह बजे जब उनकी पत्नी कीर्ति लोधी को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, सिरसौद से छुट्टी मिली, तो यह पल एक साधारण वापसी नहीं, बल्कि सामाजिक सोच का सार्वजनिक उत्सव बन गया। अस्पताल परिसर से लेकर गांव की गलियों तक उत्साह का माहौल था – जहां सात डीजे, धार्मिक और प्रेरक गीतों के साथ, बेटी के स्वागत का संदेश दे रहे थे।

अस्पताल से घर तक निकला यह अनोखा जुलूस देखते ही देखते चर्चा का विषय बन गया। आगे-आगे बजते डीजे और पीछे उल्लास में झूमता परिवार, राह चलते हर व्यक्ति के लिए यह स्पष्ट संदेश छोड़ गया कि बेटी बोझ नहीं, सम्मान और भविष्य की ताकत है।
संजीव लोधी बताते हैं कि यह कदम भावनाओं में नहीं, बल्कि सोच-समझकर उठाया गया निर्णय है। पहली बेटी के जन्म पर उन्होंने पांच डीजे के साथ खुशी मनाई थी, जबकि दूसरी बेटी के आगमन पर यह संख्या सात की – ताकि संदेश और मजबूत हो। उनका कहना है कि बेटियां किसी भी स्तर पर बेटों से कम नहीं हैं। खेल, शिक्षा, प्रशासन और राजनीति – हर क्षेत्र में बेटियां देश का मान बढ़ा रही हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि क्रिकेट में देश को गौरव दिलाने वाली टीमों में मध्यप्रदेश की बेटी क्रांति गौंड जैसी खिलाड़ी बेटियों की क्षमता का जीवंत प्रमाण हैं।

संजीव लोधी समाज की उस सोच पर भी सवाल उठाते हैं, जिसने कभी बेटियों को बोझ मानकर उनके अस्तित्व तक को नकार दिया। उनके अनुसार, सच्चाई इसके उलट है – बेटियां मायके से लेकर ससुराल और समाज तक को संवारती हैं। आज देश के सर्वोच्च पद से लेकर ग्राम पंचायत तक, महिलाएं और बेटियां जिम्मेदारी के साथ नेतृत्व कर रही हैं।
उन्होंने गर्व के साथ कहा कि दो बेटियों के पिता होना उनके लिए सम्मान और संतोष का विषय है। इस खुशी को और खास बनाने के लिए घर पर भी पारिवारिक आयोजन किया गया, जहां बेटियों की मौजूदगी ने उत्सव को भावनात्मक ऊंचाई दी।
सिरसौद गांव की यह घटना महज एक पारिवारिक खुशी नहीं, बल्कि समाज के लिए आईना है। यह एक सीधा सवाल छोड़ जाती है – जब एक पिता पूरे आत्मविश्वास और गर्व के साथ बेटी के जन्म का उत्सव मना सकता है, तो समाज अब भी पुरानी धारणाओं से बाहर क्यों नहीं निकल पा रहा?

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Raju Atulkar
Author: Raju Atulkar

"पत्रकारिता सिर्फ पेशा नहीं, जिम्मेदारी भी है…" साल 2015 से कलम की स्याही से सच को उजागर करने की यात्रा जारी है। समसामयिक मुद्दों की बारीकियों को शब्दों में ढालते हुए समाज का आईना बनने की कोशिश। — राजू अतुलकर, तेजस रिपोर्टर डिजिटल

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