रिपोर्ट – अतुल कुमार जैन
शिवपुरी | सीर बांसखेड़ी और आसपास के क्षेत्र में बसे सहरिया आदिवासी परिवारों का सब्र आखिरकार टूट गया। वर्षों से अपनी जमीन, पट्टों और अधूरे आवासों को लेकर न्याय की गुहार लगा रहे ये परिवार शुक्रवार को कड़ाके की ठंड में शिवपुरी कलेक्टर कार्यालय पहुंच गए और वहीं धरना देकर बैठ गए। “सहरिया क्रांति” लिखी तख्तियां, मासूम बच्चों की कांपती हथेलियां और खुले आसमान के नीचे बैठी महिलाओं की पीड़ा – सब कुछ प्रशासनिक उदासीनता की कहानी सुना रहा था।
50–60 साल पुरानी बसाहट, फिर भी उजाड़ने की कोशिश
इन परिवारों का कहना है कि वे लगभग छह दशक से शील बांसखेड़ी – बजरंग कॉलोनी क्षेत्र में झोपड़ियां एवं पटोर बनाकर रह रहे हैं। मजदूरी, दिहाड़ी और अस्थायी काम से जीवन यापन करने वाले इन परिवारों के पास:
पुराने राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज भूमि पट्टे मौजूद हैं,
कई परिवार भूमि पर काश्त कर रहे हैं,
और 2006 से पहले बसे होने के कारण वनाधिकार अधिनियम के तहत पात्रता भी रखते हैं।
इसके बावजूद उन्हें ट्रांसपोर्ट नगर के नाम पर बेदखली की नोटिसें दी जा रही हैं।
आदिवासी गोपाल ने बताया –
“हमारे पास वैध पट्टे हैं। फिर भी कहा जा रहा है कि यह भूमि ट्रांसपोर्ट नगर के लिए आरक्षित है। कई बार आवेदन दिए, लेकिन कोई समाधान नहीं हुआ। अब हमारे घर गिराने की तैयारी हो रही है।”
जनमन आवास: सपना अधूरा, दूसरी किस्त रोक दी गई
सहरिया आदिवासी परिवारों के लिए प्रधानमंत्री जनमन आवास योजना पहली बार पक्के घर का सपना लेकर आई।
आवेदन हुआ,ऑनलाइन सर्वे हुआ,भू-अवलोकन भी हुआ,
और कई परिवारों के आवास स्वीकृत कर पहली किस्त जारी कर दी गई।
पहली किश्त से नींव खुदाई, पिलर और कुछ दीवारें बन गईं।
लेकिन इसके बाद अचानक दूसरी किस्त रोक दी गई। कारण बताया गया ।
“भूमि ट्रांसपोर्ट नगर के लिए आरक्षित है, इसलिए निर्माण नहीं हो सकता।”
अब सवाल यह उठ रहा है –
यदि भूमि आरक्षित थी तो सर्वे किस आधार पर हुआ?
सिस्टम ने स्वीकृति कैसे दी?
पहली किस्त क्यों जारी की गई?
और जब निर्माण शुरू हो गया था, तब रोक आखिर किसकी गलती से लगी?
इसी गलती ने आदिवासियों को आधे बने मकानों, बिना छत की दीवारों और टपकती झुग्गियों में जीने पर मजबूर कर दिया है।
ठंड में बैठी महिलाएं-बच्चे; अधूरे घरों में खतरा
धरने पर बैठी महिलाओं ने कहा –
“सर्दी में बच्चे बीमार हो रहे हैं। आधा घर बना है, छत नहीं है। बारिश में पानी टपकता है, गर्मी में दीवारें तपा देती हैं। अब कहाँ जाएं?”
यह केवल निर्माण का मुद्दा नहीं, बल्कि जीवन, अस्तित्व और सम्मान का सवाल बन गया है।
“बेदखली मानवाधिकारों का उल्लंघन” – सहरिया क्रांति संगठन
सहरिया क्रांति के राष्ट्रीय संयोजक सन्जी बेचैन ने कहा –
“आदिवासियों को उनकी वर्षों पुरानी बसाहट से बेदखल करना सीधा-सीधा मानवाधिकारों का उल्लंघन है। यदि प्रशासन नहीं सुनता, तो हमें प्रदेशव्यापी आंदोलन का सामना करना पड़ेगा।”
आदिवासियों की प्रमुख मांगें
धरने पर बैठे आदिवासी परिवारों ने प्रशासन के सामने ये माँगें रखीं –
1. पट्टों वाली भूमि पर किसी भी प्रकार का निर्माण कार्य तुरंत रोका जाए।
2. रोकी गई जनमन आवास की दूसरी किस्त तत्काल जारी की जाए।
3. चल रहा बेदखली प्रकरण निरस्त किया जाए।
4. आवास निर्माण पूरा कर उन्हें सम्मानजनक आवास दिया जाए।
5. जो परिवार 2006 से पहले बसे हैं, उन्हें वनाधिकार पट्टे की पात्रता के अनुसार संरक्षण दिया जाए।
क्या प्रशासन सुनेगा यह सिहरती पुकार?
कलेक्टर कार्यालय के बाहर कड़ाके की ठंड में धरना दे रहे ये परिवार सिर्फ “छत” नहीं मांग रहे –
वे पूछ रहे हैं कि सरकार और प्रशासन ने जो सपना दिखाया था, उसे आधा छोड़ क्यों दिया?
क्या व्यवस्था अपनी ही गलती की कीमत इन गरीबों से वसूल रही है?
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Author: Raju Atulkar
"पत्रकारिता सिर्फ पेशा नहीं, जिम्मेदारी भी है…" साल 2015 से कलम की स्याही से सच को उजागर करने की यात्रा जारी है। समसामयिक मुद्दों की बारीकियों को शब्दों में ढालते हुए समाज का आईना बनने की कोशिश। — राजू अतुलकर, तेजस रिपोर्टर डिजिटल





