कहाँ तो उम्मीद थी कि न्याय का दरवाज़ा खुलेगा, समस्याओं की गठरी बंधेगी और समाधान की किरण फूटेगी, परंतु यहाँ तो व्यवस्था की चौखट पर जनता का विश्वास ही दम तोड़ता दिखा। श्रीमंत की जनसुनवाई—नाम सुनकर ही लगता है जैसे कोई राजदरबार सजा हो, जहाँ जनता अपनी गुहार लगाने आई हो। पर क्या वास्तव में यह जनता की सुनवाई थी, या फिर मात्र एक औपचारिकता, एक दिखावा, एक प्रशासनिक नाटक?
लोग आए थे आशाओं का दीप जलाकर, सोचकर कि उनकी तकलीफों का कोई हल निकलेगा। किसी की ज़मीन का विवाद था कोई भूमाफियाओं से परेशान था कोई पुलिस से परेशान था किसी को सरकारी अस्पताल में इलाज नहीं मिल रहा था,कोई अवैध उत्खनन अपने क्षेत्र में सड़क और पानी की समस्या लेकर आया था। ये समस्याएँ व्यक्तिगत नहीं थीं, ये प्रशासनिक लापरवाही का प्रमाण थीं। परंतु हुआ क्या?
कुछ आवेदन स्वीकारे गए, कुछ की किस्मत में शायद ही कोई स्थान था। जिन हाथों में न्याय की कलम होनी चाहिए थी, वे हाथ चुनिंदा कागज़ों को पोर्टल पर दर्ज कर रहे थे, और शेष आवेदनों को नीचे फेंक दिया गया। वे कागज़ नहीं थे, किसी की उम्मीदें थीं, किसी की मजबूरियाँ थीं, किसी की रातों की नींदें थीं, और किसी के जीवन की आखिरी आस भी।
आश्चर्य तो तब हुआ जब सुनवाई में आए लोगों ने देखा कि जिन आवेदनों को पोर्टल पर दर्ज करने की बात कही गई थी, वे आवेदन नीचे फेंक दिए गए। परेशान जनता अपने ही आवेदन ढूंढने को विवश थी। क्या यही ‘जन सेवा’ है? क्या यही ‘लोकतंत्र’ है? यह कैसी व्यवस्था है, जहाँ सरकारी महकमे खुद को जनता से ऊपर समझने लगे हैं?
क्यों हर बार जनता को अपने अधिकारों के लिए भीख माँगनी पड़ती है? क्यों हर बार उसे न्याय पाने के लिए गिड़गिड़ाना पड़ता है? जो अधिकारी और कर्मचारी जनता के टैक्स के पैसों से वेतन पाते हैं, वे जनता के प्रति ही इतनी असंवेदनशील क्यों हो गए हैं? क्या यह भूल गए कि उनकी कुर्सी जनता की बदौलत ही है?
सोचिए, अगर एक दिन जनता टैक्स देना बंद कर दे, तो क्या होगा? इन सरकारी दफ्तरों की इमारतें खड़ी रह पाएंगी? इन वातानुकूलित कक्षों में बैठकर ऑनलाइन पोर्टल चलाने वालों का वेतन आ पाएगा? जब जनता ही इनकी ताकत का स्रोत है, तो फिर वही जनता क्यों दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर है?
यह प्रश्न केवल पिछोर की गलियों से “जनता की अदालत” में नहीं उठ रहा, यह सवाल हर उस व्यक्ति के मन में गूंज रहा है जो इस तंत्र के सामने नतमस्तक होने को मजबूर है। यह व्यवस्था जनता की है, जनता के लिए है, परंतु क्या यह जनता द्वारा नियंत्रित है? या फिर सत्ता और प्रशासन ने इसे अपने स्वार्थों का मोहरा बना लिया है?
अगर इस अन्याय को यूँ ही सह लिया जाए, तो कल को यही अन्याय हमारी नियति बन जाएगा। इसलिए, प्रश्न उठाना जरूरी है, जवाब माँगना जरूरी है, और सबसे महत्वपूर्ण—अपनी ताकत पहचानना जरूरी है। वरना जनसुनवाई के नाम पर यूँ ही आवेदन फेंके जाते रहेंगे, और जनता अपने अधिकारों को यूँ ही कचरे में पड़ा हुआ खोजती रहेगी।
अब समय आ गया है कि जनता भी अपनी अदालत लगाए, अपने अधिकारों के लिए लड़े और इन नौकरशाहों को एहसास कराए कि वे शासक नहीं, बल्कि सेवक हैं। अन्यथा, यह ढोंग ऐसे ही चलता रहेगा, और जनता अपने ही देश में खुद को पराया महसूस करती रहेगी।
हालांकि अधिकारियों का अब इस मामले में कहना है कि सभी आवेदन सुरक्षित हैं और स्कैनिंग प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी। प्रशासन का दावा है कि कुछ असामाजिक तत्वों ने जानबूझकर अव्यवस्था फैलाने और अफवाह फैलाने की कोशिश की।
एसडीएम पिछोर शिवदयाल धाकड़ के अनुसार, “यह मामला पंजीयन काउंटर का है, जहां लोगों की शिकायतें दर्ज की जा रही थीं। कुछ लोगों ने योजनाबद्ध तरीके से काउंटर पर रखे स्कैन आवेदनों को फेंक दिया और अफवाह फैला दी।”

वहीं, कलेक्टर शिवपुरी रविंद्र कुमार चौधरी ने स्पष्ट किया कि “जो लोग व्यवस्था बिगाड़ने की कोशिश कर रहे हैं, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।”









