रिपोर्ट-अतुल कुमार जैन
शिवपुरी जिले के करेरा तहसील के ग्राम मुजरा से बंधुआ मजदूरी के लिए महाराष्ट्र ले जाए गए 15 आदिवासियों को प्रशासन और सहरिया क्रांति संगठन की पहल से सुरक्षित वापस लाया गया। उनकी वापसी के साथ ही पूरे गाँव में उत्सव का माहौल है। गाँववालों ने ढोल-नगाड़ों की धुन पर नृत्य करते हुए उनका स्वागत किया और “सहरिया क्रांति जिंदाबाद” के नारों से आसमान गूँज उठा।
जानकारी के अनुसार, नरवर क्षेत्र का एक दलाल, जिसे स्थानीय लोग भगत जी के नाम से जानते हैं, ने 8 मजदूरों और उनके 7 बच्चों को बेहतर रोजगार दिलाने का झांसा देकर महाराष्ट्र के सांगली जिले में एक खेत पर पहुँचा दिया। वहाँ इन सभी को बंधक बनाकर अमानवीय परिस्थितियों में रखा गया। इनसे कहा गया कि प्रति व्यक्ति 50,000 रुपये की अदायगी के बिना इन्हें छोड़ना संभव नहीं होगा।

सहरिया क्रांति ने संभाली जिम्मेदारी
सहरिया क्रांति के सदस्यों—राम कृष्ण पाल, संतोष जाटव, अनुराग दिवेदी, और दुष्यंत सिंह—ने मुजरा गाँव का दौरा किया। वहाँ उन्होंने पीड़ित परिवारों की व्यथा सुनी और तुरंत कार्रवाई शुरू की। संगठन ने स्थानीय अमोला थाना में शिकायत दर्ज कराई और इस गंभीर स्थिति की सूचना जिला कलेक्टर रवीन्द्र कुमार चौधरी को दी।
कलेक्टर ने मामले की गंभीरता को समझते हुए सांगली जिले में एक विशेष पुलिस टीम भेजी। महाराष्ट्र पुलिस और स्थानीय प्रशासन के सहयोग से 15 आदिवासियों को मुक्त करा लिया गया। मुक्त हुए लोगों में बबलू, सुमन, रामेती, खेरू, उम्मेद, हरिबिलास, सुदामा, सपना और उनके सात छोटे बच्चे शामिल थे।
गाँव में उल्लास और जागरूकता का संदेश
बंधकों की सुरक्षित वापसी के बाद गाँव में उत्सव जैसा माहौल रहा। आदिवासी समुदाय ने ढोल-नगाड़ों के साथ अपनी खुशी का इज़हार किया। पीड़ित परिवारों ने सहरिया क्रांति और प्रशासन के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि इस मुहिम ने न केवल उनकी स्वतंत्रता लौटाई, बल्कि उन्हें अपने अधिकारों के प्रति जागरूक भी किया।
सहरिया क्रांति के संयोजक संजय बेचैन ने इस सफलता को प्रशासनिक सहयोग और सामूहिक प्रयासों का नतीजा बताया। उन्होंने कहा, “यह घटना अन्य समुदायों के लिए एक संदेश है कि संगठित होकर अन्याय का सामना किया जा सकता है।”
मुक्त हुई महिलाओं की दर्दभरी आपबीती
बंधुआ मजदूरी से मुक्त हुई महिलाओं ने अपनी पीड़ा बयां करते हुए कहा, “हमने नरक से लौटकर नई ज़िंदगी पाई है।” उन्होंने बताया कि उन्हें जानवरों की तरह रखा गया, दिन-रात काम करवाया गया और खाने के लिए मुश्किल से एक वक्त का भोजन दिया जाता था। यदि थककर रुकते, तो उन्हें गालियाँ और मारपीट झेलनी पड़ती। बच्चों को भी भूखा रखा जाता था।








