जिलाध्यक्ष चयन में भाजपा का अंतर्द्वंद उभरा : जसमंत जाटव या राजू बाथम?, गाइडलाइन में फंसी भाजपा, सिंधिया बनाम मूल भाजपाई पर संग्राम जारी

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अतुल कुमार जैन, शिवपुरीे
मध्यप्रदेश में भाजपा जिलाध्यक्ष के चयन को लेकर सियासी घमासान तेज हो गया है। शिवपुरी समेत कई जिलों में इस मुद्दे पर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। हर सुबह यह खबर आती है कि सूची आज जारी होगी, लेकिन हर शाम वही इंतजार की घड़ी लंबी हो जाती है। 10 जनवरी तक भी जिलाध्यक्षों की बहुप्रतीक्षित सूची पर से पर्दा नहीं उठ सका। अब चर्चा है कि यह सूची न भोपाल से जारी होगी, न दिल्ली से। बल्कि निर्वाचन अधिकारी जिले में पहुंचकर सीधे जिलाध्यक्ष की घोषणा करेंगे।

  • जिलाध्यक्ष के चयन पर उलझा शिवपुरी भाजपा का भविष्य
  • सिंधिया खेमे को नहीं मिल रही फ्रीहैंड की छूट, कौन बनेगा अध्यक्ष?
  • गुटबाजी के जाल में फंसी भाजपा, जिलाध्यक्ष का चुनाव टला
  • क्या जसमंत जाटव को मिलेगा सिंधिया का समर्थन?
  • भाजपा की गाइडलाइन या सिंधिया की पसंद: कौन जीतेगा यह सियासी दंगल?

सिंधिया खेमे पर लगी शर्तों की फेहरिस्त

शिवपुरी, गुना और अशोकनगर जिलों में जिलाध्यक्ष का चयन खासा पेचीदा हो गया है। सूत्रों के मुताबिक, केंद्रीय मंत्री और स्थानीय सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया को जिलाध्यक्ष चुनने की जिम्मेदारी तो दी गई है, लेकिन उन पर कई शर्तें थोप दी गई हैं।
इन शर्तों में सबसे अहम यह है कि सिंधिया खेमे से भाजपा में आए किसी भी नेता को जिलाध्यक्ष नहीं बनाया जाएगा। साथ ही, 60 वर्ष से अधिक आयु वाले नेता और वे जो साढ़े चार साल तक जिलाध्यक्ष रह चुके हैं, इस दौड़ से बाहर हो जाएंगे। इस गाइडलाइन का सबसे बड़ा असर मौजूदा जिलाध्यक्ष राजू बाथम पर पड़ा है। बाथम संघ और भाजपा के निष्ठावान कार्यकर्ता होने के साथ सिंधिया के भरोसेमंद माने जाते हैं, लेकिन उम्र और कार्यकाल की शर्त ने उन्हें रेस से बाहर कर दिया।

जसमंत जाटव: सिंधिया के संभावित उम्मीदवार?

सिंधिया खेमे से सबसे मजबूत दावेदारी पूर्व विधायक जसमंत जाटव की मानी जा रही है। 24 जनवरी से सक्रिय हुए जाटव ने सिंधिया खेमे के निर्देश पर बायोडाटा भी जमा कर दिया है। जाटव अनुसूचित जाति से आते हैं और कट्टर सिंधिया समर्थक रहे हैं। जातिगत समीकरणों के चलते सिंधिया खेमे का मानना है कि जाटव की नियुक्ति से भाजपा को राजनीतिक लाभ होगा। हालांकि, जाटव का पिछला चुनाव हार जाना उनकी उम्मीदवारी पर सवाल खड़े कर सकता है।

गाइडलाइन के कारण उलझी गुत्थी

यदि भाजपा की गाइडलाइन को अक्षरश: लागू किया गया, तो सिंधिया खेमे से मनीष अग्रवाल का नाम प्रमुख हो सकता है। वहीं, गाइडलाइन से हटकर फैसला लिया गया तो राजू बाथम और जसमंत जाटव में से किसी एक की ताजपोशी संभव है।

मूल भाजपाई बनाम सिंधिया समर्थक की जंग

यदि सिंधिया की अनदेखी हुई, तो जिला महामंत्री गगन खटीक या सोनू बिरथरे में से किसी एक का नाम जिलाध्यक्ष के लिए चुना जा सकता है। यह साफ है कि जिलाध्यक्ष चयन केवल एक पद का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह भाजपा के भीतर सिंधिया समर्थकों और मूल भाजपाइयों के बीच शक्ति प्रदर्शन का प्रतीक बन गया है।

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भाजपा में गुटबाजी का यह ताजा उदाहरण न केवल संगठन के अंदरूनी मतभेदों को उजागर करता है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा करता है कि क्या भाजपा नेतृत्व जिलाध्यक्ष चयन को लेकर आम सहमति बना पाएगा या यह अंतर्द्वंद पार्टी के भीतर दरारें पैदा करेगा।

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