✍️ उसकी आवाज़ में एक अजीब-सी थरथराहट है…जैसे हर शब्द के साथ कोई दर्द बाहर आना चाहता हो। वो कहती है—
“मैंने बस एक ही बात कही थी… मुझे एक बच्चा चाहिए…” इतनी-सी इच्छा…
लेकिन यही उसकी सबसे बड़ी ‘गलती’ बन गई।
वह बताती है कि शादी के कुछ ही समय बाद…
जब वह तीन महीने की गर्भवती थी…
तब परिस्थितियां ऐसी बनाई गईं कि उसका गर्भपात करा दिया गया। उसके बाद…
बिना उसकी इच्छा के उसकी नसबंदी भी करवा दी गई।
“मुझसे पूछा तक नहीं गया… बस सब तय हो गया…”

उसके लिए यह सिर्फ एक ऑपरेशन नहीं था—
यह उसके सपनों का दमन था…
उसकी मां बनने की इच्छा का अंत।
लेकिन दिल मानने को तैयार नहीं था।
समय के साथ उसने फिर से उम्मीद जुटाई…
सोचा शायद अब हालात बदलेंगे…
शायद अब उसे भी बच्चा मिल जाएगा…
जिसे वह अपनी गोद में ले सके।
उसने अपनी नसबंदी भी खुलवा ली…
लेकिन इस बार भी उसके हिस्से में निराशा ही आई।
परिवार के दबाव में आकर
उसके पति ने खुद की नसबंदी करा ली।
अब हर रास्ता बंद हो चुका था।
“अब तो जैसे उसकी चाहत का ही अंत कर दिया गया…”
वह कहती है कि यह दोनों की दूसरी शादी है।
दोनों के अपने-अपने बच्चे हैं…
उसके पति के पहले विवाह से एक बेटा है…
जो शादी के वक्त 14 साल का था…
और उसके साथ उसकी अपनी एक बेटी है।
घर में सब कुछ होते हुए भी…
उसके दिल में एक गहरा खालीपन है—
एक और बच्चा…
जो उसके सुख-दुख का सहारा बने…
वो कहती है—
“क्या मुझे मां बनने का हक नहीं…?”
यह सवाल उसके भीतर बार-बार उठता है।लेकिन जवाब में उसे मिलता है—

उलाहना… ताने…
और कभी-कभी घर छोड़कर चले जाने की धमकी।
“अगर तुम्हें रहना है तो ऐसे ही रहो… नहीं तो चली जाओ…”
उसके लिए यह सिर्फ शब्द नहीं…
उसके मन की रोज़ की चोट है।
लेकिन इस कहानी का एक और पहलू है…
जो इसे और भी ज्यादा चौंकाने वाला बनाता है।
आश्चर्य की बात यह है कि यह परिवार समाज में धार्मिक प्रवृत्ति का माना जाता है।
लोग इन्हें सौम्य… सात्विक… संस्कारी कहते हैं।
बाहर से सब कुछ आदर्श दिखता है…
लेकिन अंदर…
एक औरत की इच्छाएं और अधिकार
धीरे-धीरे खत्म किए जा रहे हैं।
वह अपने पति के बारे में भी कहती है—
“वो बुरे इंसान नहीं हैं…
मेरी जरूरतों का ध्यान रखते हैं…
मुझे तकलीफ देना नहीं चाहते…”
लेकिन…परिवार के दबाव में आकर वो हर बार हदें पार कर देते हैं।
और हर बार…उसकी आवाज़… उसकी इच्छा…पीछे छूट जाती है।
उसकी पीड़ा यहीं खत्म नहीं होती…
वह धीमे स्वर में एक और बात बताती है—
जो किसी भी मां को भीतर तक झकझोर दे।
पति के पहले विवाह से जो बेटा है…
उसके व्यवहार को लेकर
वह कई बार असहज महसूस कर चुकी है।
वह कहती है—
उसका उसकी बेटी के प्रति रवैया ठीक नहीं है…
और यही डर…उसे हर पल बेचैन रखता है।

“मैं अपनी बच्ची को लेकर हमेशा डरी रहती हूं…”
एक तरफ मां बनने की अधूरी इच्छा…
दूसरी तरफ अपनी बेटी की सुरक्षा की चिंता…
और ऊपर से टूटता हुआ रिश्ता।
वह कहती है—
“मैंने इस घर को बचाने के लिए सब कुछ किया…
झुकी… समझाया… रोई… लेकिन बदले में मुझे क्या मिला…?”
उसकी जिंदगी की सच्चाई और भी दर्दनाक है…
उसके न माता-पिता हैं… न कोई भाई-बहन… वह बिल्कुल अकेली है।
पहले पति…
जो शराब का आदी था…
उसने पहले ही उसकी जिंदगी को बर्बाद कर दिया था।
और अब…दूसरी शादी में भी
वह फिर उसी दर्द, उसी संघर्ष से गुजर रही है।
परिस्थिति अब उस मोड़ पर खड़ी है…
जहां लोग उसे समझौता करने की सलाह दे रहे हैं…
कुछ कानूनी रास्ते की बात करते हैं…

लेकिन उसके दिल में अब भी एक छोटी-सी उम्मीद है—कि शायद कोई उसे समझे…
उसकी बात सुने…और उसे उसका हक मिले।
यह कहानी सिर्फ एक महिला की नहीं है…
यह उन तमाम महिलाओं की कहानी है,
जो रिश्तों को बचाने के लिए खुद को खो देती हैं।
जिनकी इच्छाएं…जिनके अधिकार…जिनकी भावनाएं…
समाज और परिवार के दबाव में कुचल दी जाती हैं। यह कहानी हम सबके सामने कुछ सवाल छोड़ती है—
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क्या एक महिला की मां बनने की इच्छा भी उसकी अपनी नहीं रही?
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क्या शादी के बाद उसके शरीर पर उसका अधिकार खत्म हो जाता है?
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क्या रिश्तों में फैसले सिर्फ एक पक्ष ही करेगा?
और सबसे बड़ा सवाल—
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क्या एक महिला का इस तरह शोषण करना ठीक है?
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क्या उसकी चुप्पी को सहमति मान लेना सही है?
वह आज भी इंतजार में है…किसी चमत्कार का नहीं…बस अपने हिस्से के अधिकार… सम्मान… और इंसाफ के…

👉🏻 पढ़ते रहिए “मन की व्यथा” –
तेजस रिपोर्टर के इस विशेष कॉलम में, जहां हम उन अनकही कहानियों को शब्द देते हैं, जो अक्सर समाज की भीड़ में दबकर रह जाती हैं।
यह वह मंच है…जहां कोई अपनी पीड़ा कहता है…
कोई अपने टूटे सपनों की कहानी सुनाता है…
तो कोई अपने भीतर छुपे दर्द को पहली बार आवाज़ देता है।
यहां हम आपको रूबरू कराएंगे उन सच्चाइयों से—
जो दिखती नहीं… लेकिन जी जाती हैं,
जो कही नहीं जातीं… लेकिन हर दिन महसूस की जाती हैं।
हर कहानी में होगा—
एक मन का बोझ…एक दर्द की सच्चाई…
और कहीं न कहीं… एक उम्मीद की किरण।
“मन की व्यथा” सिर्फ कहानियों का कॉलम नहीं है— यह उन लोगों की आवाज़ है,
जो बोलना चाहते हैं… लेकिन सुनने वाला कोई नहीं होता।
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Author: PANKAJ JAIN
पत्रकारिता में 2009 से सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। "दैनिक अग्निबाण" में लंबी पारी के बाद "SCN NEWS" सहित कई संस्थानों में न्यूज़ डेस्क का नेतृत्व किया। वर्तमान में सा. "क्राइम अगेंस्ट न्यूज", दैनिक "तेजस रिपोर्टर" और कई डिजिटल प्लेटफार्म के संपादकीय प्रमुख हैं। सामाजिक सरोकारों, विशेषकर हाशिए पर खड़े वर्ग और अन्याय के मुद्दों पर लेखन में विशेष रुचि रखते हैं। इसके साथ ही "जिनोदय" और "पंकज का पंच" जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के निदेशक हैं, जो जनचेतना और वैचारिक संवाद को बढ़ावा देने का माध्यम हैं।










