धरोहर भी आहत, आस्था भी व्यथित : उपेक्षा की मार झेल रही आशापुरी की प्राचीन जैन प्रतिमा

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📰 पंकज जैन ‘प्रखर’
आशापुरी (रायसेन) | मध्यप्रदेश की ऐतिहासिक धरती पर स्थित आशापुरी गांव आज एक ऐसी विरासत की मौन पीड़ा का साक्षी बना हुआ है, जो केवल पत्थर नहीं, बल्कि हजारों वर्षों की आस्था, कला और संस्कृति की जीवंत अभिव्यक्ति है। यहां परमारकालीन सतमासिया जैन मंदिर समूह में स्थित जैन तीर्थंकर की कायोत्सर्ग मुद्रा में विशाल खड्गासन प्रतिमा आज उपेक्षा के कारण जमीन पर खंडित अवस्था में पड़ी है—न सुरक्षा, न संरक्षण… और न ही वह सम्मान, जिसकी वह अधिकारी है।

भोजपुर के विश्वप्रसिद्ध भोजेश्वर मंदिर के समीप स्थित आशापुरी कभी मंदिरों की समृद्ध नगरी रहा है। 10वीं-11वीं शताब्दी में परमार शासकों द्वारा निर्मित यहां 25 से अधिक मंदिरों के अवशेष आज भी उस वैभवशाली युग की गवाही देते हैं।

लाल बलुआ पत्थरों पर उकेरी गई भूमिजा शैली की यह स्थापत्य कला आज भी देखने वालों को चकित कर देती है।

इन्हीं में स्थित सतमासिया जैन मंदिर समूह की यह प्रतिमा, जिसे जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ से जोड़ा जाता है, लगभग साढ़े चार मीटर ऊंची भव्य कायोत्सर्ग मुद्रा में निर्मित है।

कुंतिल केश, आभामंडल, लंबे कर्ण और शास्त्रीय अलंकरण इसे अद्वितीय बनाते हैं। लेकिन विडंबना यह है कि इतनी महान कलाकृति आज धूप-बारिश और असामाजिक तत्वों के बीच खुले आसमान के नीचे असुरक्षित पड़ी है।

प्रतिमा के हाथ-पांव खंडित होकर अलग पड़े हैं, कुछ हिस्से मिट्टी में धंसे हुए हैं—मानो यह धरोहर स्वयं अपनी उपेक्षा की कहानी कह रही हो। जिस स्थान को पुरातत्व विभाग ने संरक्षित घोषित किया, वहीं आज देखरेख के अभाव में यह प्रतिमा निरंतर क्षरण का शिकार हो रही है।

इंजीनियर अजीत कुमार जैन (भोपाल) बताते हैं कि आशापुरी क्षेत्र में परमारकालीन स्थापत्य की अनूठी झलक देखने को मिलती है, जहां भूतनाथ, बिलौटा धाम और सतमासिया जैसे मंदिर समूह भूमिजा शैली में लाल बलुआ पत्थरों से निर्मित किए गए थे।

उनके अनुसार सतमासिया जैन मंदिर समूह परिसर को भले ही पुरातत्व विभाग द्वारा सीमाबद्ध कर संरक्षित घोषित किया गया है, लेकिन वास्तविकता में यहां सुरक्षा और देखरेख का अभाव साफ दिखाई देता है। परिसर के बीच स्थित जैन तीर्थंकर की विशाल प्रतिमा, जिसे भगवान आदिनाथ से जोड़ा जाता है, आज भी खंडित अवस्था में जमीन पर पड़ी है और धूप-बारिश के साथ-साथ असामाजिक तत्वों के कारण लगातार क्षति का सामना कर रही है।

उन्होंने यह भी बताया कि इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में जैन प्रतिमाएं संग्रहालय में सुरक्षित हैं, जो 10वीं-11वीं शताब्दी की उत्कृष्ट कला का उदाहरण हैं, लेकिन इतनी महत्वपूर्ण धरोहर होने के बावजूद समुचित संरक्षण और संवर्धन के अभाव में यह स्थल अपनी संभावनाओं के अनुरूप विकसित नहीं हो पा रहा है।

आस्था पर आघात, इतिहास पर प्रश्न

यह केवल एक प्रतिमा नहीं, बल्कि जैन धर्म की आस्था का प्रतीक और भारतीय कला-परंपरा की अनुपम धरोहर है। जिस क्षेत्र में अन्य मंदिरों के पुनरुद्धार के प्रयास किए जा रहे हैं, वहां इस प्रतिमा की उपेक्षा कई गंभीर प्रश्न खड़े करती है—
  • क्या हमारी विरासत का संरक्षण चयनात्मक होगा?
  • क्या आस्था का सम्मान केवल शब्दों तक सीमित रह जाएगा?

मिट्टी में दबती पहचान, चबूतरों पर सिमटी आस्था

चिंताजनक स्थिति यह भी है कि आशापुरी गांव के कई स्थानों पर आज भी प्राचीन जैन प्रतिमाएं बिखरी और उपेक्षित अवस्था में पड़ी हुई हैं। कहीं ये धूल-मिट्टी में आधी दबी हैं, तो कहीं बिना किसी संरक्षण के खुले में पड़ी हैं।

ऐसे में स्थानीय लोग अपनी श्रद्धा अनुसार इन प्रतिमाओं को चबूतरों पर स्थापित कर पूजा-अर्चना तो कर रहे हैं, लेकिन यह व्यवस्था न तो सुरक्षित है और न ही इन ऐतिहासिक धरोहरों के अनुरूप। संरक्षण के अभाव में ये अमूल्य प्रतिमाएं धीरे-धीरे क्षरण और नुकसान का शिकार हो रही हैं, जो न केवल हमारी सांस्कृतिक विरासत की गंभीर दुर्दशा को दर्शाता है, बल्कि शासन-प्रशासन की अनदेखी और उदासीनता पर भी सवाल खड़े करता है।

जैन धर्मावलंबियों की पीड़ा और मांग

जैन धर्मावलंबियों ने प्रशासन और भारतीय पुरातत्व विभाग से भावनात्मक अपील करते हुए मांग की है कि—
  • इस प्रतिमा को उसी स्थान पर सम्मानपूर्वक पुनः स्थापित किया जाए।
  • इसके संरक्षण हेतु उपयुक्त शेड का निर्माण कराया जाए
  • स्थल की नियमित सुरक्षा और निगरानी सुनिश्चित की जाए।
  • क्षेत्र में यहां-तहां बिखरी पड़ी जिन धरोहर को संरक्षित किया जाए।

विरासत बचाने का समय

आशापुरी में ही संग्रहालय में संरक्षित जैन प्रतिमाएं, भोजपुर में भगवान शांतिनाथ का प्राचीन तीर्थ और आचार्य मानतुंगाचार्य के चरणचिह्न इस क्षेत्र की धार्मिक महत्ता को और भी बढ़ाते हैं।

यदि सतमासिया समूह की यह प्रतिमा भी संरक्षित हो जाए, तो यह स्थान जैन धर्मावलंबियों के लिए एक महत्वपूर्ण तीर्थ बन सकता है।
आज जरूरत है कि यह “जैन धरोहर” फिर से सम्मान के साथ खड़ी हो…
क्योंकि जब इतिहास गिरता है, तो केवल पत्थर नहीं टूटते—प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ के ज्येष्ठ पुत्र प्रथम चक्रवर्ती भरत के नाम से विकसित भारत की भारतीय संस्कृति, सभ्यता और धरोहर भी घायल होती है।
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तत्कालीन रायसेन कलेक्टर अशोक शाह, जिन्होंने इतिहास को फिर से जीवित किया

                                  अशोक शाह, तत्कालीन कलेक्टर (रायसेन)
उल्लेखनीय है कि वर्ष 2001 के आसपास रायसेन के तत्कालीन कलेक्टर रहे अशोक शाह ने आशापुरी और नीलगढ़ जैसे ऐतिहासिक स्थलों की पहचान कर उन्हें नई दिशा देने का कार्य किया।

बाद में वर्ष 2010 में जब वे पुरातत्व विभाग में आयुक्त के पद पर पदस्थ हुए, तब उनके प्रयासों से आशापुरी में व्यवस्थित खुदाई कार्य प्रारंभ कराया गया।

इस उत्खनन में 26 प्राचीन मंदिरों के अवशेष सामने आए, जिसने इस क्षेत्र के समृद्ध इतिहास को उजागर कर दिया।

उनके दूरदर्शी नेतृत्व और पहल के कारण ही आशापुरी की यह धरोहर राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना सकी। इस महत्वपूर्ण योगदान के लिए सकल जैन धर्मावलंबी एवं क्षेत्रवासी उनके प्रति आभार व्यक्त करते हैं।


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PANKAJ JAIN
Author: PANKAJ JAIN

पत्रकारिता में 2009 से सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। "दैनिक अग्निबाण" में लंबी पारी के बाद "SCN NEWS" सहित कई संस्थानों में न्यूज़ डेस्क का नेतृत्व किया। वर्तमान में सा. "क्राइम अगेंस्ट न्यूज", दैनिक "तेजस रिपोर्टर" और कई डिजिटल प्लेटफार्म के संपादकीय प्रमुख हैं। सामाजिक सरोकारों, विशेषकर हाशिए पर खड़े वर्ग और अन्याय के मुद्दों पर लेखन में विशेष रुचि रखते हैं। इसके साथ ही "जिनोदय" और "पंकज का पंच" जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के निदेशक हैं, जो जनचेतना और वैचारिक संवाद को बढ़ावा देने का माध्यम हैं।

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