एस.के.मेहरा | भोपाल मप्र | मध्यप्रदेश की राजनीति में एक दौर ऐसा भी रहा, जिसे आज भी “कांग्रेस का स्वर्णिम युग” कहा जाता है। यह वह समय था जब कमलनाथ, दिग्विजय सिंह, अर्जुन सिंह, मोतीलाल बोरा और श्यामाचरण शुक्ल जैसे दिग्गज नेताओं के दम पर प्रदेश में कांग्रेस का दबदबा कायम था। इन नेताओं का सिर्फ सत्ता पर कब्जा नहीं था, बल्कि उनकी पकड़ संगठन, कार्यकर्ताओं और जनता—तीनों पर समान रूप से मजबूत थी। यही कारण था कि उस दौर में कांग्रेस का राज लगभग एकतरफा माना जाता था।

मजबूत नेतृत्व, मजबूत संगठन
इन पांचों नेताओं में से चार—अर्जुन सिंह, मोतीलाल बोरा, श्यामाचरण शुक्ल और दिग्विजय सिंह—संयुक्त मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे, जबकि कमलनाथ बाद के दौर में प्रदेश की कमान संभालने वाले चेहरे बने। हर नेता अपने क्षेत्र का “पावर सेंटर” था और राजनीति में उनका एक अलग ही आभामंडल (Aura) देखने को मिलता था।
श्यामाचरण शुक्ल: तीन बार सत्ता के शिखर पर
श्यामाचरण शुक्ल मध्यप्रदेश के तीन बार मुख्यमंत्री रहे।
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पहली बार 1969 में
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दूसरी बार 1975 में
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तीसरी बार 1989 में
तीनों ही बार उन्हें शीर्ष नेतृत्व का भरोसा मिला, जो उनकी राजनीतिक पकड़ और कद को दर्शाता है।

अर्जुन सिंह: रणनीति के माहिर
अर्जुन सिंह ने 1980 में मुख्यमंत्री बनकर लंबा कार्यकाल संभाला। उनकी राजनीतिक पकड़ इतनी मजबूत थी कि वे प्रदेश ही नहीं, राष्ट्रीय राजनीति में भी अहम भूमिका निभाते रहे।

मोतीलाल बोरा: संतुलन के सूत्रधार
मोतीलाल बोरा 1985 और 1989 में मुख्यमंत्री बने। उन्हें अक्सर उस दौर की गुटबाजी के बीच संतुलन बनाने वाले नेता के रूप में देखा जाता है।

दिग्विजय सिंह: राजनीति के चाणक्य
मध्यप्रदेश की राजनीति में “रणनीतिकार” के रूप में पहचान बनाने वाले दिग्विजय सिंह(राजा साहब) का दौर 1993 से 2003 तक चला। लगातार 10 वर्षों तक मुख्यमंत्री रहना उनकी राजनीतिक समझ और संगठन क्षमता का प्रमाण है। वे ऐसे नेता माने जाते हैं जो हर धड़े को साथ लेकर चलने की कला जानते थे—चाहे वो दिल्ली हो या प्रदेश की राजनीति। हाल ही में राज्यसभा से रिटायर्ड हुए है

कमलनाथ: दिल्ली से लेकर भोपाल तक पकड़
कमलनाथ लंबे समय तक राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में रहे, लेकिन मध्यप्रदेश की राजनीति में भी उनकी पकड़ हमेशा मजबूत रही।
2018 में मुख्यमंत्री बनने के पीछे उनकी संगठन क्षमता और दिग्विजय सिंह का समर्थन अहम माना जाता है।

स्वर्णिम दौर से बदलाव तक
एक समय था जब मध्यप्रदेश कांग्रेस का गढ़ माना जाता था। लेकिन धीरे-धीरे राजनीतिक परिस्थितियाँ बदलीं और भारतीय जनता पार्टी ने अपनी जड़ें मजबूत कर लीं। सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के दौरान मध्यप्रदेश से छत्तीसगढ़ अलग हुआ। छत्तीसगढ़ कांग्रेस का मजबूत आधार था, उसके अलग होने से कांग्रेस को बड़ा झटका लगा, जबकि भाजपा को इसका सीधा फायदा मिला।
निष्कर्ष:
मध्यप्रदेश में कांग्रेस का स्वर्णिम युग सिर्फ सत्ता का दौर नहीं था, बल्कि मजबूत नेतृत्व, रणनीति और जनाधार का संगम था।
आज भी प्रदेश की राजनीति में जब उस दौर की चर्चा होती है, तो ये पांच नाम सबसे पहले याद किए जाते हैं—जिन्होंने राजनीति को सिर्फ जिया नहीं, बल्कि उसे आकार भी दिया।
नोट-लेखक के अपने विचार है
Author: SURAJ MEHRA
साल 2022 से लगातार पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्यरत "सूरज मेहरा" आज भी निरंतर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। मध्यप्रदेश की राजनीति, करंट अफेयर्स में विशेष रुचि है , साथ ही ग्राउंड रिपोर्टिंग का अनुभव है , यहाँ मध्यप्रदेश की हर छोटी बड़ी हलचल पर नज़र रहती है






