जीवन भर की धर्मसाधना का उत्कर्ष: बूंदी की मनोरमा देवी बनीं आर्यिका 105 वासपूज्य मति माताजी

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📰 पारस जैन ‘पार्श्वमणि’ कोटा
जयपुर | धर्म केवल ग्रंथों का अध्ययन नहीं, बल्कि उसे आचरण में उतारना ही सच्ची साधना है। जैन दर्शन का मूल संदेश—“जीव अलग है, पुद्गल अलग है”—केवल शास्त्रीय वाक्य नहीं, बल्कि आत्मबोध की दिशा में पहला कदम है। यही तत्वज्ञान बूंदी निवासी श्रीमति मनोरमा देवी अजमेरा के जीवन में प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देता है।

गृहस्थ जीवन में तप और संयम की मिसाल

मनोरमा देवी ने वर्षों तक गृहस्थ जीवन में रहते हुए भक्ति, जाप और आत्मचिंतन को अपनी दिनचर्या का केंद्र बनाया। तीनों अष्टान्हिका और सोलह कारण जैसे पर्वों में सक्रिय भागीदारी, प्रातः 4 बजे उठकर सामायिक और पाठ, दिनभर संयमित आचरण—यह सब उनके साधक जीवन की पहचान रहा।

सर्दी, गर्मी या वर्षा—किसी भी परिस्थिति ने उनके नियमों को प्रभावित नहीं किया। सीमित परिग्रह, दो थैलों में समाहित संपूर्ण जीवन—एक में वस्त्र, दूसरे में पूजन सामग्री—उनकी वैराग्यपूर्ण वृत्ति का प्रमाण था।

जहाजपुर और बूंदी प्रवास के दौरान वे घंटों मंदिर में एकांत साधना में लीन रहतीं। भोजन से पहले जाप पूर्ण करना उनका अटल नियम था। भूख स्वीकार थी, पर धर्मध्यान का विच्छेद नहीं।

बीमारी के बीच अडिग आत्मबल

5 फरवरी 2026 को चिकित्सकीय परीक्षण में आहार नली में ट्यूमर की सूचना मिली। चिकित्सकों ने शल्यक्रिया का सुझाव दिया, पर उन्होंने स्पष्ट कहा—“मैं मुंह में नली नहीं डलवाऊँगी।” इसके बाद उन्होंने अन्न-जल का त्याग कर दिया और चार उपवास करते हुए पदमपुरा पहुंचीं।
वहाँ उन्होंने स्पष्ट भाव से कहा—“अब मैं वापस नहीं जाऊँगी, मुझे समाधि दे दो।” यह निर्णय भावावेश नहीं, बल्कि दीर्घकालीन आत्मसाधना का परिणाम था।

पदमपुरा में दीक्षा का पावन क्षण

राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी पारस जैन ‘पार्श्वमणि’ के अनुसार, परम पूज्य चारित्र चक्रवर्ती आचार्य शांतिसागर जी महाराज की परंपरा के पंचम पट्टाचार्य परम पूज्य आचार्य वर्धमान सागर जी महाराज तथा पूज्य गणिनी आर्यिका स्वस्ति भूषण माताजी और गणिनी आर्यिका सरस्वती माताजी के सानिध्य में उन्हें क्षुल्लिका दीक्षा प्रदान की गई।
पावन अतिशय क्षेत्र बाड़ा पदमपुरा (जयपुर) में आयोजित समारोह में उन्हें “क्षुल्लिका 105 वासपूज्य मति माताजी” नाम से दीक्षित किया गया। तत्पश्चात आचार्य श्री के सान्निध्य में उन्हें “आर्यिका दीक्षा” भी प्रदान की गई।

यह क्षण बूंदी जैन समाज के लिए आध्यात्मिक गौरव और भावनात्मक उल्लास का अवसर बन गया।

सल्लेखना की ओर अग्रसर

आज आर्यिका 105 वासपूज्य मति माताजी सल्लेखना समाधि की ओर अग्रसर हैं। उनका यह निर्णय जैन परंपरा में तप, त्याग और आत्मसंयम की सर्वोच्च साधना का प्रतीक माना जाता है।
उनका जीवन यह संदेश देता है कि अध्यात्म केवल प्रवचन का विषय नहीं, बल्कि निरंतर आत्मानुशासन, कषायों से मुक्ति और कर्म निर्जरा की प्रक्रिया है।

मनोरमा देवी का गृहस्थ से आर्यिका बनने तक का यह मार्ग केवल व्यक्तिगत परिवर्तन नहीं, बल्कि समूचे समाज के लिए प्रेरणा का प्रकाशस्तंभ है।
जब संसारिक मोह से ऊपर उठकर आत्मा की ओर यात्रा प्रारंभ होती है, तभी दीक्षा अपने वास्तविक अर्थ में जीवन का सर्वोच्च शिखर बनती है।
ऐसे भव्य जीवों के पुण्य की बहुत-बहुत अनुमोदना… अनुमोदना… अनुमोदना।

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PANKAJ JAIN
Author: PANKAJ JAIN

पत्रकारिता में 2009 से सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। "दैनिक अग्निबाण" में लंबी पारी के बाद "SCN NEWS" सहित कई संस्थानों में न्यूज़ डेस्क का नेतृत्व किया। वर्तमान में सा. "क्राइम अगेंस्ट न्यूज", दैनिक "तेजस रिपोर्टर" और कई डिजिटल प्लेटफार्म के संपादकीय प्रमुख हैं। सामाजिक सरोकारों, विशेषकर हाशिए पर खड़े वर्ग और अन्याय के मुद्दों पर लेखन में विशेष रुचि रखते हैं। इसके साथ ही "जिनोदय" और "पंकज का पंच" जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के निदेशक हैं, जो जनचेतना और वैचारिक संवाद को बढ़ावा देने का माध्यम हैं।

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