श्रीमद् भागवत कथा द्वितीय दिवस : संतान के संस्कार निर्माण में माता की भूमिका सर्वोपरि – आचार्य पं. सूरज पाठक

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रिपोर्ट – राजू अतुलकर
मंडीदीप | गज्जू पिपरिया रोड स्थित तुलसी मैरिज गार्डन, बालाजी कुंज, शीतल सिटी में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा एवं ज्ञान गंगा यज्ञ महोत्सव के द्वितीय दिवस भी श्रद्धा, भक्ति और ज्ञान की सरिता प्रवाहित होती रही। श्रीधाम वृंदावन से पधारे कथा व्यास आचार्य पंडित सूरज पाठक जी महाराज (कोडी वाले पंडित जी) ने द्वितीय दिवस की कथा में गोकर्ण – धुंधकारी प्रसंग के माध्यम से माता, संतान और संस्कारों के गहरे महत्व को विस्तार से समझाया।
कथा व्यास ने कहा कि संतान के भविष्य का निर्माण सर्वप्रथम माता के हाथ में होता है। संतान को किस मार्ग पर ले जाना है, उसका प्रारंभिक चरण माता ही तय करती है, क्योंकि प्रथम गुरु माता होती है। बचपन से ही उठना-बैठना, खान-पान, व्यवहार, परिवार में बड़ों का सम्मान, समाज के प्रति कर्तव्य, रिश्तों की मर्यादा और गुरु के प्रति आदर – इन सभी संस्कारों की नींव माता द्वारा ही डाली जाती है। यही संस्कार आगे चलकर संतान के जीवन दर्शन का निर्माण करते हैं।

आचार्य पंडित सूरज पाठक महाराज ने कहा कि यदि माता अपनी संतान को अच्छी सभ्यता और संस्कार प्रदान करती है, तो वही संतान आगे चलकर अपने परिवार, क्षेत्र और राष्ट्र के निर्माण में सहभागी बनती है तथा अपने कुटुंब और समाज का नाम रोशन करती है। वहीं, यदि माता धुंधकारी की माता धुंधली की तरह संतान को गलत मार्ग पर छोड़ देती है, तो वह संतान मांस, मदिरा, वेश्यावृत्ति, मारपीट, लड़ाई-झगड़े और लोगों को कष्ट देने जैसे कुकर्मों में फंसकर न केवल अपना बल्कि माता-पिता और समाज का भी विनाश कर देती है, जो अंततः नरक का कारण बनता है।
कथा के दौरान गोकर्ण–धुंधकारी की मार्मिक कथा सुनाते हुए उन्होंने बताया कि गोकर्ण महाराज अपनी माता के कुकर्मों और भाई धुंधकारी की दुर्दशा से दुखी होकर वन चले गए, जहां ऋषि-मुनियों के सत्संग से वे महान विद्वान बने। वहीं, धुंधकारी अपने पाप कर्मों के कारण मारा गया और प्रेत योनि को प्राप्त हुआ। बाद में गोकर्ण महाराज ने श्रीमद् भागवत कथा के माध्यम से धुंधकारी को मोक्ष प्रदान किया और ग्रामीणों का भी उद्धार किया।
आचार्य जी ने कहा कि यदि माता चाहे तो ध्रुव जैसी संतान का निर्माण भी कर सकती है। अच्छे संस्कार, भजन, तप, साधना और सत्कर्मों के मार्ग पर चलाकर संतान को परम ब्रह्म परमात्मा तक पहुंचने का मार्ग दिखाया जा सकता है। ऐसी संतान समाज को प्रकाश देती है, सर्वोच्च पद को प्राप्त करती है और राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान देती है।

प्रथम दिवस की कथा में भी आचार्य पंडित सूरज पाठक जी महाराज ने भगवान की भक्ति में शुद्ध भाव, शांत चित्त और सद्कर्मों के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा था कि भगवान को भोग नहीं, बल्कि भाव की आवश्यकता होती है। हर सद्कार्य में भगवान का स्मरण करने से वर्तमान और भविष्य – दोनों सुधरते हैं।

दोनों दिवस की कथाओं में श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या में उपस्थिति रही। पूरा वातावरण भक्ति, ज्ञान और संस्कारों से ओतप्रोत नजर आया। आयोजकों ने बताया कि आगामी दिनों में भी प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन होगा, जिसमें क्षेत्र के धर्मप्रेमी नागरिक बड़ी संख्या में सहभागिता कर रहे।

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Raju Atulkar
Author: Raju Atulkar

"पत्रकारिता सिर्फ पेशा नहीं, जिम्मेदारी भी है…" साल 2015 से कलम की स्याही से सच को उजागर करने की यात्रा जारी है। समसामयिक मुद्दों की बारीकियों को शब्दों में ढालते हुए समाज का आईना बनने की कोशिश। — राजू अतुलकर, तेजस रिपोर्टर डिजिटल

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