भोपाल, मध्यप्रदेश |
गौहरगंज में छह साल की बच्ची से दुष्कर्म कर फरार हुआ 23 वर्षीय आरोपी सलमान आखिरकार गुरुवार रात भोपाल के गांधी नगर इलाके से गिरफ्तार कर लिया गया। इस घटना के बाद पूरे रायसेन जिले में तनाव, आक्रोश और गुस्सा साफ दिखाई दे रहा है। गिरफ्तारी की आशंका से भागता सलमान छह दिनों तक लगातार जंगलों, सुनसान रास्तों और आउटर क्षेत्रों में भटकता रहा। मोबाइल फोन बंद रखकर और रातें फुटपाथों पर गुजारते हुए उसने अपनी पहचान छिपाने की कोशिश की, लेकिन अंततः गांधी नगर के तीन युवकों की सतर्कता और पुलिस की मेहनत ने उसकी पूरी रणनीति को ध्वस्त कर दिया।
“इनाम लेने से इंकार, पर सवाल कायम—क्या घोषणाकर्ता सलमान को पकड़वाने वाले मुस्लिम युवकों को करेंगे सम्मानित?”
21 नवंबर की शाम गौहरगंज में जिस समय बच्ची अपने घर के बाहर खेल रही थी, तभी सलमान उसे चॉकलेट का लालच देकर जंगल की ओर ले गया। वहीं उसने वह दरिंदगी की जिसने पूरे प्रदेश को दहला दिया। बच्ची की गंभीर हालत देखकर वह घबराया और घटनास्थल से फरार हो गया। इसी क्षण से उसका छह दिन का अपराधी सफर शुरू हुआ, जिसमें उसने पुलिस को बार-बार चकमा दिया और खुद को पकड़ने में हर संभव सावधानी बरती।

वारदात के तुरंत बाद सलमान जंगलों के सहारे करीब 11 मील पैदल चलता हुआ भोपाल की सीमा में घुस आया। वह जानता था कि पुलिस सभी मुख्य मार्गों पर नाकाबंदी कर चुकी है, इसलिए उसने सुनसान रास्तों, खेत-खलिहानों और पहाड़ी जंगलों का सहारा लिया। वह भोजपुर और बंगरासिया होते हुए राजधानी पहुंचा वहां पहुँचने के बाद भी वह किसी एक स्थान पर नहीं रुका। कभी फुटपाथों पर बैठा रहा, कभी मंदिरों और बस स्टैंडों के आसपास अंधेरे में छिपकर रातें बिताता रहा। मास्क पहनकर वह अपनी पहचान को छिपाने की कोशिश करता था और लम्बे समय तक मोबाइल फोन बंद रखकर तकनीकी ट्रैकिंग से बचता रहा।

लेकिन उसकी मुश्किलें तब बढ़ीं जब वह लगातार एक कमरे की तलाश में गांधी नगर और आसपास के मोहल्लों में भटकता नजर आया। लोगों से बार-बार यही पूछता कि क्या कोई खाली कमरा किराए पर मिल सकता है। यही उसकी बेचैनी उसकी सबसे बड़ी गलती बन गई। स्थानीय युवकों—अब्दुल, रिज़वान और आसिफ—ने उसकी संदिग्ध गतिविधियों को नोटिस किया। वे उसे बातचीत में उलझाते रहे, उसे चाय-खाना दिया और उसका फोटो गूगल कर सोशल मीडिया पर वायरल फोटोज़ से मिलान किया। पहचान की पुष्टि होते ही उन्होंने तुरंत पुलिस को सूचना दे दी।

रात 11:15 बजे पुलिस मौके पर पहुँची और उसे गिरफ्तार कर लिया। लेकिन पुलिस की चुनौती यहीं खत्म नहीं हुई। पकड़ में आने के चार घंटे बाद ही सलमान ने एक और प्रयास किया—इस बार पुलिस की पिस्टल छीनकर भागने का। यह घटना तब हुई जब पुलिस उसे गांधी नगर थाने से गौहरगंज ले जा रही थी। रास्ते में कीरतनगर के पास आगे चल रही पुलिस की गाड़ी का टायर पंचर हो गया।

जैसे ही गाड़ी रूकी, सलमान भी नीचे उतरा और अचानक सुल्तानगंज चौकी के एसआई श्याम राज की पिस्टल छीन ली। उसने भागते हुए दो राउंड फायर किए और अंधेरे में भागने की कोशिश की।

पुलिस ने उसे चेतावनी दी, लेकिन सलमान बार-बार गोली चलाने की कोशिश करता रहा। स्थिति को नियंत्रण में लाने और आत्मरक्षा में पुलिस ने चार राउंड फायर किए, जिनमें एक गोली उसके पैर में लगी और वह वहीं गिर पड़ा।

घटना रात करीब 3:15 से 3:30 बजे के बीच की है। इसके बाद उसे जेपी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां डॉक्टरों ने बताया कि अत्यधिक खून बहने से उसकी हालत बिगड़ गई थी। उसका ब्लड प्रेशर और पल्स तेजी से बढ़ा हुआ था, जिससे साफ दिख रहा था कि वह घबराहट और सदमे में था। प्राथमिक उपचार के बाद उसे हमीदिया अस्पताल रेफर किया गया, जहाँ उसकी सर्जरी की गई।

इसी दौरान अदालत के मजिस्ट्रेट ने अस्पताल में पहुँचकर आरोपी का मेडिकल स्टेटस देखा और पुलिस को उसकी रिमांड सौंप दी। पुलिस अब उसके ठीक होने का इंतजार कर रही है, ताकि आगे की पूछताछ और केस की विवेचना पूरी की जा सके।

दूसरी ओर, बच्ची अभी भी आईसीयू में भर्ती है। डॉक्टरों के अनुसार, उसके निजी अंग बुरी तरह क्षतिग्रस्त थे, जिसके चलते जटिल सर्जरी कर नसों का बायपास बनाना पड़ा। पूरी रिकवरी में छह महीने से अधिक समय लग सकता है और आगे भी उसे एक अतिरिक्त सर्जरी की आवश्यकता पड़ेगी। डॉक्टर अभी यह कहने की स्थिति में नहीं हैं कि बच्ची पूरी तरह सामान्य जीवन जी पाएगी या नहीं।

इस घटना के बाद गौहरगंज, रायसेन और भोपाल में आक्रोश चरम पर पहुँच गया था। पूरे जिले में पांच दिनों तक धरने और प्रदर्शन हुए। जगह-जगह लोग आरोपी की फांसी की मांग कर रहे थे। भारी दबाव और देरी से गिरफ्तारी होने के कारण मुख्यमंत्री मोहन यादव ने 26 नवंबर को उच्च अधिकारियों के साथ बैठक की थी और तत्काल प्रभाव से रायसेन एसपी पंकज पांडे को हटाकर आशुतोष गुप्ता को नया एसपी नियुक्त किया।

जांच में यह तथ्य भी सामने आया कि सलमान शाहगंज पुलिस का स्थायी वारंटी था। 2019 में घर में घुसकर मोबाइल चोरी के एक केस में उसके खिलाफ वारंट जारी किया गया था और लगातार अनुपस्थित रहने के कारण 2023 में उसे स्थायी वारंटी घोषित कर दिया गया था। इसके बावजूद वह खुलेआम घूम रहा था और किसी को भनक नहीं लगी।

गांधी नगर के तीनों युवक—अब्दुल, रिजवान और आसिफ—ने साफ कह दिया कि उन्हें किसी इनाम की लालसा नहीं है; उनकी एकमात्र इच्छा है कि सरकार जो भी पुरस्कार राशि घोषित करे, वह पूरी की पूरी पीड़ित बच्ची के उपचार और उसके परिवार की सहायता पर खर्च की जाए। इन युवकों की यह संवेदनशीलता और जिम्मेदारी इस बात का प्रमाण है कि समाज तब भी जाग्रत रहता है जब सिस्टम कहीं न कहीं चूक जाता है। सच तो यह है कि सलमान की गिरफ्तारी में स्थानीय नागरिकों की यह सजग भूमिका निर्णायक साबित हुई। अगर इन युवकों ने समय पर पहचान न की होती, तो आरोपी शायद भोपाल की सीमा पार कर सीहोर के गहरे जंगलों में समा जाता, जहां उसकी खोज और भी कठिन हो जाती।
पुलिस को क्यों लगा इतना वक्त?
यह पूरा घटनाक्रम पुलिस तंत्र, नाकाबंदी और सुरक्षा व्यवस्था की कमियों पर निस्संदेह सवाल उठाता है, लेकिन साथ ही यह भी स्वीकार करना होगा कि पुलिस ने लगातार कई दिनों तक बिना रुके, बिना थके सलमान की तलाश में जी-जान लगा दी। उनकी मेहनत और धैर्य भी सराहना के योग्य है।

एक सच यह भी है कि लगातार हो रहे प्रदर्शनों और बढ़ते जनदबाव ने पुलिस की कार्यशैली को सीधे प्रभावित किया। जिन अधिकारियों को आरोपी सलमान को पकड़ने के लिए ठोस और परिपक्व रणनीति तैयार करनी थी, वे खुद कानून-व्यवस्था संभालने में उलझे रहे। जगह-जगह प्रदर्शन, रोड ब्लॉक और भीड़ को नियंत्रित करने में इतना संसाधन, समय और जनशक्ति लग गई कि वह ऊर्जा वास्तविक खोजी कार्रवाई से हटकर व्यवस्था बनाए रखने में खप गई। इस वजह से पुलिस का फोकस बंटा और उनकी प्राथमिकता आरोपी तक पहुंचने की बजाय हालात को शांत रखने में लग गई। माना जा सकता है कि यही वह प्रमुख कारणों में से एक रहा, जिसने सलमान की गिरफ्तारी में देरी को जन्म दिया और उसे कई दिनों तक भागने का अवसर मिल गया।

मगर इन सबके बीच एक सबसे बड़ा और अनदेखा तथ्य यह है कि वही मुस्लिम युवक—जिन्हें कुछ संगठन और कुछ प्रदर्शनकारी सलमान के नाम पर एक पूरे समुदाय से जोड़कर गलत दिशा में ले जाना चाहते थे—इन्हीं युवाओं ने आगे बढ़कर इस घिनौनी वारदात को अंजाम देने वाले आरोपी को पकड़वाकर कानून के हवाले किया।

विडंबना देखिए कि जिस समाज को कुछ लोग इस अपराध के नाम पर निशाना बना रहे थे, अंत में उसी समाज के युवाओं ने वह काम कर दिखाया जिसे पूरा प्रदेश उम्मीद कर रहा था—अपराधी को पकड़कर अदालत की दहलीज़ तक पहुंचाना। यह घटना न केवल इन युवकों की हिम्मत और इंसानियत को सलाम करती है, बल्कि उन आवाज़ों को भी करारा जवाब देती है जो किसी भी वारदात को सांप्रदायिक चश्मे से देखने की कोशिश करते हैं। यह साबित करता है कि अपराधी का कोई धर्म नहीं होता—लेकिन इंसानियत का धर्म हमेशा सबसे बड़ा होता है।






