रिपोर्ट – रोबिन सिंह
जबलपुर | सामुदायिक वन अधिकार (CFR) और वन संसाधन प्रबंधन को लेकर जबलपुर में आयोजित दो दिवसीय कार्यशाला ने वनों के संरक्षण, समुदाय की भागीदारी और प्रशासनिक सहयोग के नए आयाम खोले। यह कार्यशाला परमेश्वर रिसर्च एंड डेवलपमेंट फाउंडेशन (PRDF) और अशोक ट्रस्ट फॉर रिसर्च इन इकोलॉजी एंड द एनवायरनमेंट (ATREE) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित की गई, जिसमें मध्यप्रदेश के 18 आदिवासी बहुल जिलों से आए 45 प्रतिभागियों ने भाग लिया।
वन अधिकार अधिनियम 2006 के प्रभावी क्रियान्वयन की दिशा में महत्वपूर्ण पहल
कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत मिलने वाले सामुदायिक अधिकारों की समझ बढ़ाना, उसके क्रियान्वयन में आने वाली चुनौतियों की पहचान करना और समाधान पर संवाद स्थापित करना था। कार्यशाला में मध्यप्रदेश जनजाति विभाग के टास्क फोर्स के वरिष्ठ सदस्य डॉ. शरद लेले ने प्रतिभागियों को गहन प्रशिक्षण दिया।
डॉ. लेले ने कहा, “सामुदायिक वन अधिकार केवल कागज़ी अधिकार नहीं है, बल्कि यह स्थानीय समुदायों को उनके पारंपरिक संसाधनों पर निर्णय लेने और उन्हें संरक्षित करने का संवैधानिक अधिकार देता है। इसके लिए समुदाय, प्रशासन और सामाजिक संस्थाओं के बीच मजबूत समन्वय आवश्यक है।”
प्रशिक्षण में कानून की बारीकियों से लेकर सतत प्रबंधन तक की चर्चा
कार्यशाला में प्रतिभागियों को वन अधिकार अधिनियम की कानूनी प्रक्रियाओं, दावा प्रस्तुत करने की प्रक्रिया, CFR मान्यता के बाद की जिम्मेदारियों, और वन संसाधनों के सतत (Sustainable) प्रबंधन से जुड़े practically पहलुओं पर विस्तार से जानकारी दी गई।
प्रतिनिधियों ने साझा किया कि जमीनी स्तर पर जागरूकता की कमी, प्रशासनिक प्रक्रियाओं की जटिलता और सूचनाओं की अनुपलब्धता CFR के प्रभावी क्रियान्वयन में बाधा बनती हैं।
सामाजिक संस्थाओं की भागीदारी से सामूहिक प्रयास को मिली दिशा
इस कार्यशाला में राज्य व स्थानीय स्तर की कई सामाजिक संस्थाओं के प्रतिनिधि भी शामिल हुए, जिन्होंने समुदायों को सशक्त बनाने की दिशा में अपने अनुभव और सुझाव साझा किए। चर्चा के दौरान यह महसूस किया गया कि स्थानीय ग्राम सभाओं को CFR के अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक और प्रशिक्षित करना अत्यंत आवश्यक है।
निष्कर्ष और आगे की राह
दो दिवसीय इस संवादमूलक कार्यशाला ने यह स्पष्ट किया कि यदि समुदायों को उनके अधिकारों के प्रति सजग किया जाए, और प्रशासनिक सहयोग को पारदर्शी व उत्तरदायी बनाया जाए, तो वन अधिकार अधिनियम केवल कागज़ पर नहीं, बल्कि ज़मीनी हकीकत बन सकता है।
आयोजकों ने यह भी संकेत दिया कि आने वाले महीनों में राज्य के अन्य हिस्सों में भी ऐसी कार्यशालाएं आयोजित की जाएंगी ताकि सामुदायिक वन अधिकार को लेकर राज्यभर में एक सशक्त और सहभागी आंदोलन खड़ा हो सके।
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Author: Raju Atulkar
"पत्रकारिता सिर्फ पेशा नहीं, जिम्मेदारी भी है…" साल 2015 से कलम की स्याही से सच को उजागर करने की यात्रा जारी है। समसामयिक मुद्दों की बारीकियों को शब्दों में ढालते हुए समाज का आईना बनने की कोशिश। — राजू अतुलकर, तेजस रिपोर्टर डिजिटल







