गोहरगंज में भाई दूज की अनूठी परंपरा : परंपरा, आस्था और उल्लास के रंग में रंगी भाई दूज की होली

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रिपोर्ट-प्रेमनारायण राजपूत
गोहरगंज | होली के दूसरे दिन भाई दूज के अवसर पर एक विशेष परंपरा निभाई जाती है, जो वर्षों से गाँव की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा रही है। गाँव की महिलाएं इस दिन सामूहिक रूप से एकत्र होकर होली की परिक्रमा करती हैं और पारंपरिक भजन गाते हुए इसे जल से ठंडा करती हैं। इस आयोजन में लोक-संगीत, सांस्कृतिक एकता और भावनात्मक जुड़ाव का अनोखा संगम देखने को मिलता है।
गाँव में यह मान्यता है कि जिन परिवारों ने हाल ही में किसी प्रियजन को खोया है, उनके पहले त्योहार पर महिलाएं उनके घर जाकर गुलाल अर्पित करती हैं और सांत्वना देती हैं। इसी तरह, जिन घरों में नवजात शिशु का जन्म हुआ होता है, वहाँ उत्सव का माहौल रहता है। गाँव की महिलाएं साज-सज्जा के साथ वहाँ पहुँचकर बधाई गीत गाती हैं और मिठाइयाँ व गुड़ वितरित किया जाता है। यह परंपरा न केवल सामाजिक समरसता को मजबूत करती है, बल्कि आपसी प्रेम और सद्भावना का भी प्रतीक है।

सीता माता के भजनों के साथ होली की परिक्रमा

भाई दूज की शाम को गाँव की सभी महिलाएं पारंपरिक परिधानों में सज-धजकर एकत्रित होती हैं और लोटे में जल लेकर होली की परिक्रमा करती हैं। इस दौरान ‘सीता होरी खेले जनकपुर’ और ‘सीता के हाथों में हरी-पीली चूड़ियां’ जैसे भक्तिमय गीत गाए जाते हैं। यह अनुष्ठान एक धार्मिक आस्था से जुड़ा हुआ है, जिसमें यह विश्वास किया जाता है कि जल अर्पित करने से होली की अग्नि शीतल होती है और वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
प्रेम नारायण राजपूत ने जानकारी देते हुए बताया कि यह परंपरा लगभग 70 वर्ष पूर्व से चली आ रही है, जब से हम लोग पैदा हुए हैं। इसी परंपरा के अनुसार प्रत्येक त्यौहार, विशेष रूप से होली, इसी प्रकार मनाया जाता है।
ग्राम के पटेल परिवार से रामकली पटेल, गौर पार्वती पटेल, मुन्नीबाई लोधी, लीलाबाई लोधी, मथुरावाई, देवा भाई, भारतीय लोधी, लीला जयसारी, कमलाबाई, मुन्नीबाई सेन, रामप्यारी वाई, विनीतवाई, आरती सेन, गीताबाई, बबली वाउ, रामदेवी वाई, छोटीवाई लोधी सहित सभी महिलाएं प्रतिवर्ष इस परंपरा का पालन करते हुए होली के त्यौहार को मनाती आ रही हैं। यह परंपरा पिछले 75 वर्षों से इसी तरह चली आ रही है।

पुरुषों की सहभागिता और धार्मिक अनुष्ठान

महिलाओं के साथ-साथ गाँव के पुरुष भी इस पवित्र परंपरा में भाग लेते हैं। वे भी होली की परिक्रमा कर इसे ठंडा करने की प्रक्रिया पूरी करते हैं। यह आयोजन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामुदायिक सौहार्द का प्रतीक भी है, जहाँ हर वर्ग और उम्र के लोग एक साथ मिलकर उत्सव का आनंद लेते हैं।
यह परंपरा गाँव के सामाजिक ताने-बाने को मजबूती प्रदान करती है और बताती है कि हमारी संस्कृति कितनी समृद्ध और भावनात्मक रूप से गहरी है। क्या आपके गाँव में भी ऐसी कोई अनूठी होली परंपरा निभाई जाती है? हमें कमेंट में बताइए!

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