फॉलो-अप, नकली डॉक्टर, असली खतरा : आखिर कब जागेगा स्वास्थ्य ?

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रिपोर्ट-सूरज मेहरा
भोपाल, मध्यप्रदेश | रायसेन रोड और आसपास के ग्रामीण इलाकों में धड़ल्ले से चल रहे फर्जी डॉक्टरों के मायाजाल पर जब ‘तेजस रिपोर्टर’ ने पहली रिपोर्ट प्रकाशित की, तो स्वास्थ्य विभाग हरकत में आता दिखा। बीएमओ उदयपुरा, डॉ. महेंद्र सिंह धाकड़ ने आश्वासन दिया था कि मामले की जांच होगी और दोषियों पर कार्रवाई की जाएगी। लेकिन हफ्तों बीत गए, और अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।

कार्रवाई या दिखावा? स्वास्थ्य विभाग की चुप्पी पर उठते सवाल

जब इस विषय पर दोबारा बीएमओ से बात की गई, तो उन्होंने एक नया बयान दिया— “जांच कमेटी बैठाई गई है, जल्द कार्रवाई होगी।” लेकिन सवाल यह है कि जब मामला पहले ही संज्ञान में था, तो अब तक कोई ठोस कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

ऐसे में बड़े सवाल ये हैं कि,
  • क्या स्वास्थ्य विभाग इन झोलाछाप डॉक्टरों को संरक्षण दे रहा है?
  • क्या ये डॉक्टर स्थानीय प्रशासन की मिलीभगत से लोगों की जान से खिलवाड़ कर रहे हैं?
  • अगर अवैध क्लीनिक चलाने वालों पर तुरंत कार्रवाई नहीं हो रही, तो इसकी वजह क्या है?

गांवों में बदस्तूर जारी फर्जी इलाज, प्रशासन मौन

रायसेन जिले के कई गांवों में ‘तेजस रिपोर्टर’ की टीम ने दोबारा दौरा किया और पाया कि ‘माही क्लिनिक’ सहित कई अन्य झोलाछाप क्लीनिक अब भी बिना किसी बाधा के चल रहे हैं। मरीजों का इलाज जारी है, अनपढ़ झोलाछाप डॉक्टर इंजेक्शन लगा रहे हैं, और सरकारी सिस्टम सिर्फ बयानबाजी में व्यस्त है।
एक मरीज के परिजन ने नाम न बताने की शर्त पर बताया
“हम गांव के लोग मजबूरी में इनके पास आते हैं। सरकारी अस्पताल में डॉक्टर मिलते नहीं, और जब मिलते हैं तो दवा तक नहीं देते। ये लोग भले ही बिना डिग्री के हैं, लेकिन तुरंत इलाज कर देते हैं। हमें डर तो लगता है, पर कोई और विकल्प भी नहीं है।”

बीएमओ के वादों पर सवाल

बीएमओ डॉ. महेंद्र सिंह धाकड़ पहले बोले थे, “मामले की जांच होगी और दोषियों पर कार्रवाई होगी।” अब वे कह रहे हैं, “जांच कमेटी बैठा दी गई है।” लेकिन असल सवाल यह है कि जब अवैध क्लीनिक खुलेआम चल रहे हैं, तो क्या कार्रवाई सिर्फ कागजों तक सीमित है?

क्या होना चाहिए?

तत्काल छापेमारी – स्वास्थ्य विभाग को तुरंत इन फर्जी क्लीनिक्स पर छापा मारना चाहिए और दोषियों पर FIR दर्ज करनी चाहिए।
निलंबन और जवाबदेही – जिन अधिकारियों ने अब तक कार्रवाई नहीं की, उनके खिलाफ जांच और निलंबन की प्रक्रिया शुरू होनी चाहिए।
जनता को जागरूक किया जाए – ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य से जुड़े जागरूकता अभियान चलाए जाएं, ताकि लोग झोलाछाप डॉक्टरों के पास न जाएं।
सरकारी अस्पतालों की स्थिति सुधारी जाए – गांवों में योग्य डॉक्टरों की तैनाती की जाए, ताकि ग्रामीण मजबूरी में फर्जी डॉक्टरों के पास न जाएं।

अब सवाल सरकार और प्रशासन से :

  • क्या एक और जान जाने का इंतजार कर रहा स्वास्थ्य विभाग?
  • बीएमओ और अन्य जिम्मेदार अफसरों पर कार्रवाई कब होगी?
  • क्या सिर्फ जांच कमेटी बनाकर जनता को गुमराह किया जा रहा है?
अगर जल्द ही ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह मामला सिर्फ स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही का नहीं, बल्कि एक सुनियोजित भ्रष्टाचार का उदाहरण बनेगा। ‘तेजस रिपोर्टर’ इस मुद्दे को तब तक उठाता रहेगा, जब तक दोषियों पर कार्रवाई नहीं होती।

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