अतिथि संवाददाता-संजय जैन
सिवनी के ऐतिहासिक और दिव्य दिगंबर जैन मंदिर में विराजमान भगवान पार्श्वनाथ स्वामी, जिन्हें श्रद्धापूर्वक बड़े बाबा कहा जाता है, उनकी प्रतिष्ठापना को 172 वर्ष पूर्ण हो गए हैं। यह पावन स्थल न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि अपने विशाल हिमालयी शिखरों के समान गगनचुंबी जिनालय के लिए भी प्रसिद्ध है।
जब बैलगाड़ी नागपुर की ओर बढ़ ही न सकी
मान्यताओं के अनुसार, यह अद्भुत प्रतिमा जयपुर के कुशल शिल्पकार द्वारा नागपुर के जैन समाज के लिए निर्मित की गई थी। सन 1853 में जब इसे बैलगाड़ी में रखकर नागपुर ले जाया जा रहा था, तब एक रहस्यमयी घटना घटी।

रात्रि विश्राम के बाद जैसे ही बैलगाड़ी आगे बढ़ने लगी, अचानक उसका पहिया टूट गया। मरम्मत के बाद पुनः यात्रा शुरू हुई, लेकिन कुछ ही दूरी पर एक और तकनीकी खराबी आ गई। यह सिलसिला लगातार तीन दिनों तक चलता रहा—हर सुबह बैलगाड़ी कुछ कदम चलती और कोई न कोई रुकावट आ जाती।
अंततः, शिल्पकार को एक अलौकिक स्वप्न आया जिसमें एक अदृश्य शक्ति ने संदेश दिया—”प्रतिमा का गंतव्य यही है, इसे आगे मत ले जाओ।” यह संदेश सुनकर वह हतप्रभ रह गया और स्थानीय जैन समाज को इसकी जानकारी दी। प्रारंभ में संदेह बना रहा, लेकिन जब प्रतिष्ठित श्रावक श्रेष्ठी ने इसे स्वीकार किया, तब भव्य पंचकल्याणक अनुष्ठान के साथ भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिष्ठापना सिवनी में संपन्न हुई।
नगर में सुख-समृद्धि और वैभव का विस्तार
प्रतिष्ठापना के बाद से सिवनी नगर में अपूर्व समृद्धि और धार्मिक चेतना का संचार हुआ। जैन समाज का विस्तार हुआ और भव्य जिनालयों की श्रृंखला प्रारंभ हुई। श्री जिनेंद्र रजत रथ, छोटा जैन मंदिर, शास्त्र ग्रंथागार जैसी दिव्य धरोहरों ने सिवनी को एक आध्यात्मिक केंद्र में परिवर्तित कर दिया।








