थानों में ‘विधायक प्रतिनिधि’, लोकतंत्र की मजबूती या प्रशासन का मखौल? देखें क्या बोले विधायक प्रीतम लोधी? अनोखा कदम या मजाक?

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अतुल कुमार जैन
मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले की पिछोर विधानसभा इन दिनों एक अनोखे कारण से चर्चा में है। यहां के विधायक प्रीतम लोधी ने थानों में ‘विधायक प्रतिनिधि’ नियुक्त किए हैं, जो न केवल प्रशासनिक परंपराओं को तोड़ते हैं, बल्कि संवैधानिक सवाल भी खड़े करते हैं। यह मामला सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है और लोगों के बीच आश्चर्य और आलोचना दोनों का विषय बना हुआ है।

हमने इस मामले को “विधायक का नया प्रयोग! : थाने में विधायक प्रतिनिधि, नया चलन या लोकतंत्र का माखौल?” नामक शीर्षक से प्रमुखता से उठाया था। जिसके बाद विधायक ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि जब उन्होंने पिछोर विधानसभा से चुनाव लड़ा था, तो उन्होंने हर नागरिक से यह वादा किया था कि वह यहां के लोगों और कार्यकर्ताओं को केवल प्रतिनिधि ही नहीं, बल्कि “विधायक” के रूप में देखना चाहते हैं।

क्या है विधायक का उद्देश्य?

विधायक प्रीतम लोधी का दावा है कि उन्होंने यह कदम अपने क्षेत्र को ‘नंबर 1’ बनाने के लिए उठाया है। उनका कहना है, “पिछोर का हर नागरिक खुद को विधायक के रूप में देखे और इस भावना के साथ काम करे, तभी यह क्षेत्र विकास की ओर बढ़ सकता है।” उन्होंने सभी सरकारी विभागों में प्रतिनिधियों को नियुक्त करने की योजना बनाई है, जिसमें पुलिस थाने, नगर पालिका, मंडी और अन्य कार्यालय शामिल हैं।
लेकिन सवाल यह है कि क्या यह ‘जनता की भागीदारी’ का सही तरीका है? आलोचकों का कहना है कि इस प्रक्रिया में केवल भाजपा से जुड़े कार्यकर्ताओं को ही चुना गया है। अगर यह कदम वास्तव में ‘सामाजिक बदलाव’ लाने के लिए है, तो इसमें हर विचारधारा के लोगों को स्थान मिलना चाहिए था।

सोशल मीडिया पर चर्चा और आलोचना

सोशल मीडिया पर यह मामला एक मजाक बन गया है। लोग कह रहे हैं, “अब थाने में पुलिस नहीं, विधायक प्रतिनिधि तय करेंगे कि किसे गिरफ्तार करना है और किसे छोड़ना है।” कुछ लोग इसे ‘प्रॉक्सी सिस्टम’ का नाम दे रहे हैं, जहां विधायक अपने प्रतिनिधियों के जरिए प्रशासन को नियंत्रित करना चाहते हैं।

विपक्ष ने साधा निशाना

विपक्ष ने इस पर कड़ा रुख अपनाया है। कांग्रेस और अन्य दलों ने इसे ‘लोकतंत्र का मखौल’ करार दिया है।
इंडियन नेशनल मध्यप्रदेश ने फेसबुक पर लिखा कि “कांग्रेस लगातार यह कहती आई है कि मोहन सरकार में थाने न्याय दिलाने के नहीं दलाली के अड्डे हो गए हैं!

इसका प्रमाण है कि विधायक अब थानों में विधायक प्रतिनिधि तक नियुक्त करने लगे हैं!
शायद विधायक यह निगरानी चाहते हो कि हिस्सेदारी का कोई हिस्सा छूट नहीं जाए !”
वहीं नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए भाजपा को घेरा।
उन्होंने लिखा कि “BJP के विधायकों को व्यवस्थागत प्रशिक्षण की ज्यादा जरूरत !!!
#शिवपुरी जिले की #पिछोर_विधानसभा के विधायक #प्रीतम_लोधी ने अपने क्षेत्र के थाने का भी विधायक प्रतिनिधि नियुक्त कर दिया !

ये अपनी तरह का संभवतः पहला मामला है! जबकि, ऐसी कोई व्यवस्था भी नहीं है कि विधायक थाने के लिए भी किसी समर्थक को प्रतिनिधि बना दे ! @BJP4MP को चाहिए कि विधायकों को व्यवस्थागत प्रशिक्षण दे कि उन्हें क्या नहीं करना है!”

क्या यह संवैधानिक है?

संवैधानिक विशेषज्ञों के अनुसार, विधायक द्वारा थानों में प्रतिनिधि नियुक्त करना न केवल प्रशासनिक परंपराओं का उल्लंघन है, बल्कि संवैधानिक प्रक्रिया का भी मजाक है। संविधान का अनुच्छेद 50 कार्यपालिका और न्यायपालिका के अधिकारों को स्पष्ट रूप से परिभाषित करता है। पुलिस थाने और अन्य सरकारी संस्थानों में नियुक्तियों का अधिकार केवल राज्य सरकार के पास है।

विधायक का तर्क और जनता की शंका

प्रीतम लोधी ने दावा किया कि यह कदम ‘पुरानी परंपराओं को तोड़ने’ और जनता को सशक्त बनाने के लिए उठाया गया है। लेकिन क्षेत्रीय जनता और विशेषज्ञों के मन में सवाल उठता है कि यह ‘सशक्तिकरण’ केवल भाजपा कार्यकर्ताओं तक ही सीमित क्यों है?

क्या कहता है प्रशासन?

शिवपुरी कलेक्टर रवींद्र कुमार चौधरी ने इसे ‘पहली बार का मामला’ बताया और कहा कि इस तरह की नियुक्ति के कोई प्रावधान नहीं हैं।

यह स्पष्ट करता है कि विधायक का यह कदम न केवल अनधिकृत है, बल्कि पुलिस की स्वायत्तता पर भी सवाल खड़े करता है।

लोकतंत्र का नया अध्याय या खतरा?

पिछोर विधानसभा का यह मामला एक बड़े सवाल की ओर इशारा करता है: क्या यह लोकतंत्र को मजबूत करने की पहल है, या फिर प्रशासन पर एकतरफा नियंत्रण की कोशिश? प्रीतम लोधी का ‘हर नागरिक विधायक’ का सपना कितना व्यवहारिक और संवैधानिक है, यह तो समय ही बताएगा। लेकिन फिलहाल, यह घटना लोकतंत्र और प्रशासन के संतुलन पर गंभीर बहस छेड़ चुकी है।

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Author: Tejas Reporter

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