इंदौर, देश की स्वच्छता सूची में शीर्ष पर काबिज शहर, अपनी सफाई के स्तर को नए आयामों तक ले जाने की कोशिश में है। यहां की सड़कों पर झाड़ू इतनी बार चल चुकी है कि धूल के कण भी अब आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ने लगे हैं। कचरा डिब्बे अब अपनी खाली हालत पर विलाप कर रहे हैं, और कचरा संग्रहण वाहन, बेरोजगारी की चुनौती से जूझ रहे हैं।

इसी स्वच्छता अभियान को नई ऊंचाई देने के लिए सरकार ने एक अनूठा कदम उठाया—बाहर से कचरा आयात करने का। अचानक ध्यान भोपाल गैस त्रासदी के उस 337 टन जहरीले कचरे पर गया, जो दशकों से उपेक्षित पड़ा था। तत्काल निर्णय लिया गया कि इस कचरे को इंदौर के पास पीथमपुर में जलाया जाएगा। स्वच्छता का नया अध्याय लिखने की यह कोशिश, हालांकि, विवादों के घेरे में आ गई।
जनता का विरोध और सरकार की सफाई
जहरीले कचरे को जलाने की योजना ने स्थानीय लोगों को आक्रोशित कर दिया। लोग सड़कों पर उतर आए। किसी ने आत्मदाह की धमकी दी तो किसी ने पुलिस की लाठियों का सामना किया। विरोध करने वालों का कहना था कि स्वच्छता के नाम पर जहरीले कचरे को अपनाना आत्मघाती है। ये बात भी बिल्कुल सही है।

लेकिन मुख्यमंत्री ने मामले को शांत करने की कोशिश की। उनका बयान था, “यह कचरा 40 साल पुराना है और अब निष्क्रिय हो चुका है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन किया जा रहा है। कृपया इसे राजनीतिक रंग न दें।”
सवाल और चिंतन :

यहां सवाल उठता है कि यदि यह कचरा निष्क्रिय हो चुका है, तो इसे जलाने की आवश्यकता क्यों है? क्या यह इंदौर की स्वच्छता से प्रभावित होकर पुनर्जीवित होना चाहता है? या फिर यह सरकार के स्वच्छता के प्रति अटूट समर्पण का प्रतीक है, जो किसी भी हद तक जाकर इंदौर को “कचरा-मुक्त” बनाना चाहती है, भले ही इसके लिए बाहर से कचरा मंगवाना पड़े।
कचरा और ग्रीन कॉरिडोर :
जनता के विरोध के बावजूद, 12 कंटेनर जहरीले कचरे के पीथमपुर पहुंचने की कहानी भी कम रोचक नहीं थी। इसे लाने के लिए “ग्रीन कॉरिडोर” का इस्तेमाल किया गया ताकि इसकी “पवित्रता” को रास्ते में कहीं नुकसान न पहुंचे। वैज्ञानिक तरीके से इसे जलाने की योजना है, जिससे न केवल इंदौर की स्वच्छता की प्यास बुझेगी, बल्कि स्वच्छता अभियान का यह अध्याय इतिहास में दर्ज हो सकेगा।









