आठ दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा : पं. सूरज पाठक के प्रवचनों से भक्त हो रहे धर्ममय

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रिपोर्ट : राजू अतुलकर
मंडीदीप | नगर के तुलसी मैरिज गार्डन शीतल सिटी फेज 4 स्थित बालाजी हनुमान मंदिर परिसर में सोमवार से आठ दिवसीय संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा का कलश यात्रा के साथ आयोजन प्रारंभ हुआ।
कलश यात्रा श्री राम मंदिर मधुबन कॉलोनी पिपलिया गज्जू रोड से 11:00 बजे प्रारंभ होकर विभिन्न मार्गों से होते हुए कथा स्थल तक पहुंची। कलश यात्रा का शहर में श्रद्धालुओं द्वारा जगह-जगह पुष्प वर्षा कर स्वागत किया गया। कलश यात्रा में भारी संख्या में महिलाएं कलश व श्रीफल लिए चल रही थीं। यात्रा में बड़ी संख्या में शहर के प्रबुद्ध नागरिक शामिल थे। पूर्ण विधि-विधान के बाद श्रीमद् भागवत कथा प्रराभं हुई। कथा प्रतिदिन दोपहर 2 बजे से प्रारंभ होकर देर शाम 5 बजे तक की जा रही है।

प्रथम दिवस कथा व्यास आचार्य पंडित सूरज पाठक ने श्रीमद् भागवत के महात्मय के बारे में विस्तार से बताते हुए कहा कि कथा श्रवण का फल भाग्यशाली को ही मिलता है।
कथा में तीसरे दिन कथा वाचक पंडित सूरज पाठक ने कहा की सत्य सनातन संस्कृति, सभ्यता और संस्कारों की सुरक्षा के लिए प्रत्येक नागरिक को सदमार्ग पर चलना चाहिए। विषम परिस्थितियों में भी धर्म-ध्वजा को थामें रखना चाहिए।
तीसरे दिन भक्त प्रह्लाद की कथा :
कथावाचक सूरज पाठक ने भक्त प्रहलाद का चरित्र सुनाते हुए बताया कि हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र प्रहलाद को अन्याय के मार्ग पर ले जाने के लिए अनेकों प्रयास किए। प्रहलाद को अग्नि में जलाने का प्रयास किया, पर्वतों से फेंक कर, तलवारों से काटकर सत्यमार्ग से भटकाने का प्रयास किया। हिरण्यकश्यप ने अनेक प्रकार से पूरी ताकत लगाकर प्रहलाद को मारने का प्रयास किया। परंतु सत्य और धर्म-मार्ग पर अडिग रहने के कारण वो प्रहलाद का बाल बांका भी नहीं कर  पाया।
इस  अवसर पर वरिष्ठ समाजसेवी जगदीश प्रसाद सोनी, प्रेम नारायण शर्मा, आचार्य सुरेंद्र भार्गव, गुलाब सिंह मारण, संजय द्विवेदी सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए ।
वहीं चौथे दिवस की कथा के अवसर पर कथा व्यास आचार्य पंडित सूरज पाठक ने कहा कि जब-जब धरती पर अन्याय,आतंक, दुराचार और अत्याचार बड़ता है परमात्मा  मनुष्य रूप धारण करके आतंक और अन्याय का अंत करते है और सुख-समृद्धि तथा शांति की स्थापना करते हैं।  हमारी सनातन संस्कृती कल्याण की भावना रखती है । जो लोग दुष्ट प्रवृत्ति के होते हैं वह समाज में भय का वातावरण तैयार करके संपूर्ण जनमानस को कष्ट देने का काम करते हैं । संपूर्ण प्राकृतिक वातावरण की शुद्धता को नष्ट करने का काम करते हैं और धर्म की व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करके अधर्मता का काम करते हैं । ऐसे लोगों से सावधान रहने की आवश्यकता है । आज हमें अपनी आने वाली पीढ़ी को नैतिक, स्वास्थ्य और धर्म शिक्षा देने की नितांत आवश्यकता है । आज बच्चे अपने माता-पिता , अपने गुरु और अपने घर-परिवार से दूर होते जा रहे हैं ।
अंततः बच्चे अपने माता-पिता को या तो भीख मांगने अथवा वृद्ध आश्रमों में जाने के लिए मजबूर कर रहे हैं। कई बड़े-बड़े उद्योगपतियों के मां-बाप आज वृद्ध आश्रम का सहारा ले रहे हैं, मोहताज है अपनी संतान से मिलने के लिए । इसका सबसे बड़ा कारण है पाश्चात सभ्यता और शिक्षा का अनुसरण करना।
माता-पिता अपने बच्चों को विदेश पढ़ने के लिए भेज देते हैं, अपने घर-परिवार, रिश्तेदारों से दूर कर देते हैं जिससे उनके पास ना तो हमारी सभ्यता बचती है ना संस्कृति और संस्कार ।
श्री पाठक जी ने कहा आजकल मां-बाप के सामने ही बच्चे पान- गुटखा, धूम्रपान, मांस-मदिरा का सेवन करने लगे हैं । संस्कारवान बच्चे ना तो  मां-बाप की सुनते हैं और और न गुरु की मानते हैं। यदि ऐसी ही स्थिति रही तो निश्चित तौर पर बच्चे बड़े होकर अवसाद से ग्रस्त होकर अपने आप को नष्ट कर लेंगे इसके लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है उन्हें संस्कारवान बनाना । उन्हें पुनः गीता, भागवत, रामायण जैसे ग्रंथों से जोड़ने की । इसके लिए प्रत्येक घर परिवार के लोग अपनी संतान को निश्चित तौर पर रामायण गीता भागवत की ओर अग्रसर करें जिससे समाज में एक सात्विक वातावरण पैदा हो और भय मुक्त समाज का निर्माण हो सके।

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