बैतूल समाचार | आदिवासी छात्रावासों की दुर्दशा : अधीक्षक नदारद, पियून के भरोसे छात्रावास

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रिपोर्ट-सूरज मेहरा
BETUL NEWS | मध्यप्रदेश के आदिवासी बाहुल्य जिले बैतूल में स्थित आदिवासी छात्रावासों की हालत गंभीर सवाल खड़े करती है। इन छात्रावासों में बच्चों के रहने, खाने और पीने की व्यवस्थाओं में भारी अनियमितताएँ पाई गई हैं। बच्चों के स्वास्थ्य और शिक्षा से जुड़ी ये लापरवाहियाँ सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगाती हैं।

आलम यह है कि कई छात्रावासों में एक बिस्तर पर दो छात्र सो रहे हैं, न तो कड़कड़ाती ठंड में ढंग से ओढऩे बिछाने का इंतज़ाम है । और न ही पौष्टिक भोजन की उपलब्धता। पिछले दिनों तेजस रिपोर्टर की टीम ने छात्रावासों का जायजा लिया तो सरकारी दावों की पोल खुल गई।

छात्रावासों में मीनू के आधार पर भोजन व नाश्ता मिलना तो दूर देखने को भी नहीं मिला। कई छात्रावास ऐसे भी हैं जहां पेयजल की टंकियों में काई और गंदगी का अंबार है, शौचालय खस्ताहाल पड़े हैं, परिसर में गंदगी और दुर्गंध से बच्चे बेहाल हैं।

ऐसे में सरकार और प्रशासन को इस मामले को गंभीरता से लेना चाहिए। भविष्य के इन निर्माताओं के प्रति ऐसी लापरवाही केवल समाज के लिए ही नहीं, बल्कि देश के लिए भी घातक साबित हो सकती है।

  • बड़े सवाल :
  • बच्चों के स्वास्थ्य और सुरक्षा की गारंटी कौन लेगा?
  • आदिवासी बच्चों के भविष्य को दांव पर लगाने का अधिकार किसने दिया?
  • आखिर किसकी मेहरबानी पर मलाई काट रहे छात्रावासों के जिम्मेदार अफसर?
  • इन लापरवाहियों के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर क्या होगी कार्रवाई ?
पानी और सफाई में लापरवाही :

छात्रावास में बच्चों के लिए पीने का पानी तक सुरक्षित नहीं है। हमारी टीम ने पानी की टंकियों की स्थिति देखी तो उनमें सड़ा-गला कचरा पाया गया, जिसे देखकर स्पष्ट है कि साफ-सफाई का ख्याल महीनों से नहीं रखा गया। यही पानी बच्चों को पीने के लिए दिया जा रहा है, जो गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है। शौचालयों की स्थिति भी बेहद खराब है। बदबू और गंदगी से भरे शौचालयों को देखकर लगता है कि उनकी सफाई महीनों से नहीं की गई।

खाने की गुणवत्ता और मेनू से खिलवाड़ :

छात्रावासों में बच्चों को भोजन के नाम पर भी भारी अनियमितताएँ झेलनी पड़ रही हैं। अधीक्षक और अधीक्षिका दावे करते हैं कि बच्चों को मेनू के अनुसार पोषक और स्वादिष्ट भोजन दिया जा रहा है, लेकिन हकीकत कुछ और ही बयां करती है। हमारी टीम ने जब बच्चों से बात की तो उन्होंने डर के कारण कुछ भी बोलने से इंकार कर दिया। हालांकि, एकांत में पूछे गए सवालों पर बच्चों ने बताया कि उन्हें मेनू के अनुसार भोजन नहीं मिलता और कई बार गुणवत्ता भी खराब होती है।

रहने की बदतर स्थिति :

कई छात्रावासों में रहने की व्यवस्था भी चिंताजनक है। गंदगी और साफ-सफाई की कमी के कारण बच्चे अस्वच्छ वातावरण में रहने को मजबूर हैं। कई जगह एक ही बिस्तर पर दो-दो बच्चों को सोते हुए पाये गए। इससे बच्चों के स्वास्थ्य और मानसिक स्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

पियून के भरोसे छात्रावास :

जिला प्रशासन की लापरवाही तब और उजागर हुई जब हमारी टीम ने पाया कि कई छात्रावास अधीक्षकों की गैरहाजिरी में पियून के भरोसे चल रहे हैं। जब चौकीदार से इस बारे में पूछा गया, तो उसने बताया कि अधीक्षक साहब किसी शादी या मैयत में गए हुए हैं। ऐसे में बच्चों की देखभाल और अनुशासन का जिम्मा पियून पर छोड़ दिया गया है।

प्रशासन की चुप्पी पर सवाल :

यह स्थिति केवल बैतूल जिले तक सीमित नहीं है, बल्कि आदिवासी छात्रावासों की दुर्दशा पूरे प्रदेश की प्रशासनिक उदासीनता को उजागर करती है। बच्चों का भविष्य जिन हाथों में सुरक्षित होना चाहिए, वही हाथ अपनी जिम्मेदारियों से भागते नजर आ रहे हैं। ऐसे में तेजस रिपोर्टर आपको आगे भी ऐसे ही अपडेट देता रहेगा।


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